नंदकिशोर भी भाजपा के भ्रम के शिकार, स्पीकर के लिए एनडीए के विजय का मुकाबला विपक्षी चौधरी से

पटना। बिहार की नई विधानसभा में बुधवार को पहला शक्ति परीक्षण हो सकता है। इस दिन 17वीं विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव होना है। इससे एक दिन पहले सत्तारूढ़ एनडीए के अंदर और बाहर दिलचस्प स्थिति बन गई। अब तक भाजपा के जिस वरिष्ठ नेता नंदकिशोर यादव का स्पीकर बनना तय माना जा रहा था, उनका पत्ता अचानक कट गया है। उसी तरह, जैसे नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले सुशील मोदी का कट गया था। कारण भी वही। सुशील मोदी की तरह ही नंदकिशोर यादव को भी नीतीश कुमार से नजदीकी की कीमत चुकानी पड़ी। उनकी जगह अब स्पीकर पद का चुनाव लखीसराय के भाजपा विधायक विजय सिन्हा लड़ेंगे। जबकि महागठबंधन की तरफ से सीवान से चुनकर आए राजद विधायक और पूर्व मंत्री अवध बिहारी चौधरी को उम्मीदवार बनाया गया है। महागठबंधन ने अपना उम्मीदवार पिछड़ा समुदाय से यादव नेता को बनाया है। वहीं एनडीए के प्रत्याशी विजय सिन्हा भूमिहार जाति से आते हैं। अवध बिहारी चौधरी को मैदान में उतारने का फैसला भाकपा (माले), कांग्रेस और राजद नेताओं की बैठक के बाद तेजस्वी यादव ने किया। दोनों तरफ से उम्मीदवारों की घोषणा के बाद विधानसभा के अंदर सरकार और विपक्ष के बीच पहला शक्ति परीक्षण बुधवार यानी 25 नवंबर को होना तय हो गया है।

महागठबंधन प्रत्याशी अवध बिहारी चौधरी

कहना ना होगा कि 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए गठबंधन को बहुमत है। उसके पास जहां एक निर्दलीय समेत 126 विधायक हैं, वहीं विपक्षी महागठबंधन के पास 110 विधायक ही हैं। बाकी सात में निर्दलीय और अन्य हैं। संख्या बल के लिहाज से एनडीए उम्मीदवार का स्पीकर बनना तय है। दरअसल भाजपा ने दो उप मुख्यमंत्रियों में से एक अति पिछड़ा समुदाय और दूसरा पिछड़ी जाति से बनाया था। इसलिए विधानसभा अध्यक्ष का पद अगड़ी जाति के विधायक को देने पर पार्टी में सर्वसम्मति बनी। अगड़ी जाति में भी पार्टी ने भूमिहार विधायक को खोजना शुरू किया, तो वरिष्ठ विधायक विजय कुमार सिन्हा पर तलाश पूरी हो गई। बता दें कि सत्तारूढ़ गठबंधन में सरकार बनने से पहले ही स्पीकर की कुर्सी इस बार भाजपा को दे दी गई थी। इस कारण नंदकिशोर यादव का नाम सबसे आगे चल रहा था। यह कहते हुए कि जिस तरह डिप्टी सीएम रहे सुशील मोदी के सम्मान की रक्षा की जा रही है, वैसे ही पार्टी में सबसे पुराने विधायक का भी खयाल रखा जाएगा। पहले उन्हें ही डिप्टी सीएम बना देने की बात चली थी। लेकिन नीतीश कुमार से नजदीकी के कारण ऐसा नहीं किया गया। कहा गया कि जब नीतीश कुमार के किसी करीबी को ही डिप्टी सीएम बनाना है तो सुशील मोदी ही ठीक हैं। इस तर्क पर वह डिप्टी सीएम बनने से रह गए। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने विजय सिन्हा को मनोनीत कर यह संदेश भी दिया है कि इस बार सुशील मोदी हों या नंदकिशोर यादव या प्रेम कुमार, उनकी जगह अब नए लोगों को बढ़ाया जाएगा। पार्टी के इस फैसले के बाद अब सबकी निगाहें राज्यसभा की एक सीट के लिए उपचुनाव पर टिक गई है। बदले हालात में पूछा जा रहा है कि क्या पार्टी सुशील मोदी को राज्यसभा की सीट के लिए वाकई मनोनीत कर देगी?

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