प्रशांत किशोर बनाएंगे नई पार्टी, लड़ेंगे पंचायत चुनाव

आर्यांश, पटना। बिहार में भाजपा जहां 2020 में पांच वर्ष बाद यानी 2025 की राजनीति कर रही है, वहीं जदयू से निकाले गए प्रशांत किशोर पांडेय उर्फ पीके दस वर्ष बाद की राजनीति शुरू करने जा रहे हैं। उनकी कंपनी आई-पैक के टी-10 यानी दस साल के टारगेट का लक्ष्य मुख्यमंत्री का पद है। इन दस वर्षों में ऐसे सारे प्रयास किए जाएंगे, जो 2030 तक पीके को मुख्यमंत्री का पद दिला दे। कहना ही होगा कि इस दौरान बढ़ती उम्र के कारण जदयू नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और तमाम दलों के पुरानी पीढ़ी के नेताओं का युग समाप्त हो चुका होगा। चूंकि किसी भी दल में दूसरी पंक्ति का कद्दावर नेता नहीं है, इसलिए स्थितियां उनके अनुकूल हो भी सकती हैं। इस दिशा में पीके की शुरुआत होगी मार्च में शुरू होने वाले पंचायत चुनाव से पहले। इसके लिए प्रशांत किशोर नए साल में नई पार्टी बनाने जा रहे हैं।

बिहार में प्रशांत किशोर जो कुछ करने वाले हैं, उनसे जदयू की नींद उड़ सकती है। इसलिए कि जदयू में रहते हुए ही पीके ने अपनी राजनीति के लिए ठोस जमीन तैयार कर ली थी। जाहिर है, उनकी नई पार्टी में जदयू में रहते हुए उनका तैयार किया हुआ लाव-लश्कर भी आएगा। यानी पिछले कुछ वर्षों में अन्य दलों से जदयू में शामिल कराए गए वैसे लगभग दर्जन भर बड़े नेता, जिनके साथ हजारों समर्थक भी आए थे। वे सब प्रशांत किशोर के माध्यम से ही जदयू में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं, जितने भी पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े पदाधिकारी यानी मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति के सदस्य, जिला पार्षद, ब्लाक प्रमुख, जिला प्रमुख, जिला परिषद के प्रमुख हैं, उन सबसे गत वर्षों में सीधा संबध बनाया गया था। यह सब उन्होंने जदयू के लिए किया था, जिसका सीधा फायदा उन्हें पंचायत चुनाव में मिलेगा। बता दें कि बिहार में पंचायती राज के तहत कुल पदों की संख्या 8400 है। बताया जाता है कि इनमें से लगभग तीन हजार पदाधिकारी ऐसे हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर ने जदयू में शामिल कराया था। ये आज भी पीके और उनकी कंपनी-आईपैक-के संपर्क में हैं।

सवाल है कि जब जमीनी तैयारी इतनी थी तो विधानसभा का चुनाव क्यों नहीं लड़ा? तो इसका जवाब है कि खुद लड़ा तो नहीं, लेकिन लड़ाया खूब। सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार और जदयू के खिलाफ चिराग पासवान को आइडिया देने वालों में प्रशात किशोर भी थे। बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट- वाला नारा पीके ने तब दिया था, जब वह जदयू से अलग हो रहे थे। कहना ना होगा कि विधाननसभा चुनाव में चिराग का नारा भी यही था। ऐसे में बिहार में इस बार का पंचायत चुनाव कई कारणों से ऐतिहासिक होने वाला है। भाजपा के दबाव में इस बार दलगत आधारित पंचायत चुनाव होने की चर्चाएं हैं। दलगत आधारित चुनाव होने से पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा जा सकता है। यानी प्रत्याशी सीधे-सीधे कांग्रेस, भाजपा, राजद और जदयू जैसी पार्टी की ओर से चुनाव लड़ेंगे। दलगत आधार पर पंचायत चुनाव होने से प्रशांत किशोर को अपनी नई पार्टी को बढ़िया स्टार्ट दिलाने का मौका मिल जाएगा, जिसका इंतजार उन्हें काफी पहले से था। हालांकि दलगत आधार पर चुनाव कराने का अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेना है। भाजपा तो इसके लिए तैयार बैठी है। संयोग से पंचायती राज का विभाग भी पहली बार भाजपा के पास है। यह विभाग उपमुख्यमंत्री रेणु देवी के पास है। गौरतलब है कि जेपी नड्डा के नेतृत्व में भाजपा पीटूपी (पंचायत टू पार्लियामेंट) फॉर्मूले पर काम कर रही है। इसके तहत भाजपा पंचायत से संसद तक विस्तार में लगी है। इसमें राजस्थान में पंचायत चुनाव में मिली जीत से भाजपा और उत्साहित है। वैसे पंचायत चुनाव जैसे भी हो, पीके गुल खिलाने को तैयार हो गए हैं। बस नए साल में नई पार्टी का इंतजार कीजिए।

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