इधर चिराग तो उधर फूटेगा ओवैसी बम

अंशुमान, दरभंगा। बिहार में इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायने में अनोखा साबित होने वाला है। इधर, उधर, सब तरफ घर के चिराग से परेशानी और तनाव है। दोस्त की दुश्मनी और दुश्मन की दोस्ती की अनोखी मिसाल कायम की जा रही है। सत्तारूढ एनडीए और विपक्षी महागठबंधन के नेता एक-दूसरे के निशाने पर स्वाभाविक तौर पर हैं। खेल तो हो रहा है खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान से। ऐसा ही खेल महागठबंधन के किले में सेंधमारी करके ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायन्स के हैदराबाद वाले नेता असददुद्नी ओवैसी कर रहे हैं। ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) का बिहार में रालोसपा और बसपा के साथ गठबंधन है। पिछले दो-तीन दिनों में सीमांचल के अलावा मध्य और पूर्व बिहार में ओवैसी की सभा में जैसी भीड़ उमड़ी है, वह महागठबंधन के लिए शुभ संकेत नहीं है। राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन की ताकत ही माय यानी मुस्लिम-यादव समीकरण है। उसी माय में से मुस्लिम बड़े पैमाने पर ओवैसी की ओर जाते दिख रहे हैं। ओवैसी खुलेआम कहते हैं कि जिस तरह नीतीश सरकार में कहीं कुछ नहीं हुआ, उसी तरह उनसे पहले वालों के 15 साल के शासनकाल में भी मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं किया गया। इस तरह जो महागठबंधन इस बात से खुश चल रहा था कि घर के चिराग से ही एनडीए की तबाही हो सकती है, उसके वोट बैंक में ओवैसी की सेंधमारी से हिसाब बराबर होता दिख रहा है।

महागठबंधन के नेता पहले चरण की वोटिंग से पहले लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान की उस अपील से गदगद हैं कि नीतीश कुमार को पसंद नहीं करने वाले भाजपाई उनकी पार्टी यानी लोजपा को वोट दें। बता दें कि चार-पांच दिनों से चिराग लगातार बिहार के अलग-अलग हिस्सों में सभा कर रहे हैं और वोट की अपील कर रहे हैं। वह भाजपा के प्रति अपने प्रेम छिपा भी नहीं रहे हैं। चिराग ने समर्थकों से साफ-साफ कहा है कि जिस विधानसभा सीट पर लोजपा के प्रत्याशी हों, वहां उन्हें वोट दें और जहां नहीं हों तो भाजपा के पक्ष में मतदान करें। इस सिलसिले में विजयादशमी पर ट्वीट भी किया। चिराग ने नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए लिखा है कि आने वाली सरकार नीतीश मुक्त बनेगी। वह खुले मन से लोगों से कह रहे हैं कि इस बार की सरकार नीतीश कुमार के बगैर बनेगी। यही कारण है कि उन्होंने #असंभव नीतीश की मुहिम भी चला रखी है।

उधर, ओवैसी की आक्रामक प्रचार शैली बिहार में एक नए तरह का ध्रुवीकरण पैदा कर रहा है। सीमांचल की 15 से 17 सीटों पर मुसलमान मतदाता जहां निर्णायक हैं, वहीं मध्य और पूर्व बिहार में कई ऐसी सीटें हैं, जहां मुस्लिम मतदाता परिणाम को प्रभावित करते हैं। बता दें कि पिछले चुनाव में ओवैसी की पार्टी छह सीटों पर चुनाव लड़ी थी और सभी जगह बुरी तरह हार हुई थी। पांच सीटों पर तो उनके प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई थी। लेकिन 2019 में किशनगंज सीट पर हुए उपचुनाव में एआईएमआईएम के कमरूल होदा ने जीत दर्ज कर राज्य में नए तरह के समीकरण के जन्म लेने को पुख्ता किया। इस तरह ओवैसी और रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा के गठबंधन से यादव और मुस्लिम वोट बैंक का ही बिखराव हो रहा है। कहना ही होगा कि इस वोट बैंक पर लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद का एकाधिकार रहा है। ऐसे में यूडीएसए के निशाने पर जो मतदाता हैं, वे महागठबंधन के ही हैं। इसलिए यूडीएसए को जितना भी वोट मिलेगा, वह महागठबंधन को ही नुकसान पहुंचाएगा। हालांकि राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी किसी प्रकार के नुकसान को नकारते हुए कहते हैं, “बिहार में दो धाराओं के बीच लड़ाई है। इसके अलावा जो भी लोग इस चुनाव में आ रहे हैं, वे किसके इशारे पर आ रहे हैं, यहां के लोग जानते हैं। भाजपा के खिलाफ लड़ाई को जो भी कमजोर करने की कोशिश करेंगे, उनको जनता खुद जवाब देगी।”

वैसे भी भाजपा और जदयू की तरह ही राजद के घर में भी प्रत्याशियों के चयन से शुरू हुआ असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा। पिछले दिनों चार विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निकाल बाहर करना पड़ा था। अब पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल होने और अनुशासनहीनता के आरोप में अपने 23 सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। पार्टी ने खुद बताया है कि बांका, पश्चिम चंपारण और बक्सर क्षेत्र के कुल 23 बागी प्रत्याशियों और नेताओं के खिलाफ एक्शन लिया गया है। इस तरह जैसी आग इस तरफ लगी हुई है, वैसी ही दूसरी तरफ भी दिख रही है। ऐसे में किसने किसका खेल बिगाड़ा, यह चुनाव बाद परिणामों से ही स्पष्ट हो सकेगा।

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