है बात कुछ ऐसी कि चुप हैं नीतीश, वरना क्या बात करनी उन्हें नहीं आती

आर्यांश, पटना। बिहार में मंगलवार को भारत बंद रहा। लेकिन उस बंद की चर्चा नहीं हो रही, जो कई दिनों से जारी है। नई सरकार में काम बंद है। विधानसभा चुनाव में जनता दल-यूनाइटेड यानी जदयू की सीटें क्या कम हुईं, कि सरकार चलाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का उत्साह ही कम हो गया। 10 नवंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद 16 को नई सरकार का गठन हो गया था। इसके अगले दिन नई विधानसभा के पहले सत्र के लिए अनिवार्य कैबिनेट बैठक के बाद नीतीश मंत्रिमंडल की बैठक नहीं हुई है। ऐसा तब है, जब पिछली सरकारों के समय नीतीश कुमार हर मंगलवार या बुधवार को कैबिनेट बैठक करते रहे हैं। इस सरकार में ऐसा नहीं होने से कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। सबसे प्रमुख यह कि एनडीए सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दरभंगाटाइम्स.कॉम इस ओर लगातार इशारा करता रहा है।

नीतीश कुमार कभी भी बड़बोले मुख्यमंत्री नहीं रहे। उनके अब तक के सियासी करियर को देखें, तो इस चुनाव में ही सबसे अधिक बोले हैं। मनोविज्ञान कहता है कि आदत के विपरीत कोई अधिक या कम बोलता है तो इसे उसकी बेचैनी समझनी चाहिए। चुनाव के दौरान हमने इस मंच से कई बार बताया था कि कैसे धरातल पर भाजपा और जदयू के कार्यकर्ता तालमेल नहीं दिखा रहे थे। गठबंधन में जदयू का वोट तो भाजपा या एनडीए में शामिल अन्य दलों को मिला। लेकिन जदयू के लिए ऐसा ही भाजपाई वोट के बारे में नहीं कहा जा सकता। यह साबित हो चुका है कि जदयू की सीटों पर चिराग पासवान की पार्टी लोजपा को भी भाजपाई वोट मिले। इस कारण विधानसभा में जदयू के सदस्य कम हो गए। पिछले दिनों जब पार्टी ने चुनाव परिणामों की समीक्षा के लिए हारे हुए प्रत्याशियों की बैठक बुलाई, तो उसमें भी आमराय यही थी। हारे हुए कुछ बड़े नेताओं ने ऐसे में भाजपा के साथ संबधों की समीक्षा तक की जरूरत बता दी। सूत्रों के मुताबिक, खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी चुनाव बाद से भाजपा की दिख रही भूमिका से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं। उन्हें सुशील मोदी को राज्यसभा भेजा जाना कतई पसंद नहीं आया है। मोदी बिहार में भाजपा के चेहरा थे। उनके रहते जदयू नेता को भाजपा से कभी कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन बदले हालात में वैसे बात नहीं रह गई है। एक तो पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री के साथ दो-दो डिप्टी सीएम चिपका दिए। फिर विधानसभा में संख्या बल के कारण भाजपा के अधिक मंत्री हो गए हैं और आगे बढ़ते ही जाएंगे। जो भाजपाई मंत्री हैं, उनमें से कुछ गाहे-बगाहे चिराग पासवान से प्रेम भी जताते रहते हैं। इतना ही नहीं, भाजपा के मंत्री मुख्यमंत्री के बजाय अपनी पार्टी के आलाकमान से निर्देश ले रहे हैं। इससे अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है। सूत्र बताते हैं कि ऐसे में कैबिनेट बैठक बुलाने का उत्साह ही वह महसूस नहीं करते। तो क्या सरकारी कामकाज में मुख्यमंत्री की दिलचस्पी कम हो गई है? या फिर भितरखाने भाजपा से टकराव शुरू हो गया है? इस पर दोनों पार्टियां और उनके नेता भले मौन हों, लेकिन सचिवालय के गलियारे नहीं। फिलहाल तो इतना ही नहीं, इस सबका असर सरकारी कामकाज पर पड़ रहा है।

चिराग लेकर खोज रहे पुराने साथी-

कहना ही होगा कि जदयू में पहले से दसवें नंबर तक खुद नीतीश कुमार ही नेता हैं। दूसरे नेताओं की गिनती इसके बाद शुरू होती है। ऐसे में पार्टी के अंदर वैसा कोई करीबी नहीं है जो सुशील मोदी जैसा सलाहकार की भूमिका निभा सके। पिछले दिनों उन्होंने पुराने साथी और रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा को साथ जोड़ने की कोशिश की थी। जदयू में रालोसपा के विलय की बात अभी बनी नहीं है। इसलिए भरोसे के दूसरे साथियों की तलाश भी शुरू कर दी है। ऐसे नेताओं से वह लगातार संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कभी उनके साथ थे और नीतीश के कारण ही जदयू छोड़ कर चले गए थे। ऐसे ही नेता हैं नरेंद्र सिंह। उनक् बेटे सुमित सिंह चकई से बतौर निर्दलीय चुनाव जीत चुके हैं। मंत्री बनने के आश्वासन पर उन्होंने नीतीश सरकार को समर्थन भी दे दिया है। अब नीतीश उनके पिता और छिटक गए पुराने साथी पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह को पार्टी में लाना चाहते हैं। यह स्थिति उनकी हताशा और बेचैनी को ही बताती है। इसलिए कि यह वही नरेंद्र सिंह हैं, जिन्होंने प्रेस के सामने नीतीश को कभी धोखेबाज तक कहा था। बताया था कि 2005 में उनके ही प्रयासों से नीतीश मुख्यमंत्री बने थे और फिर उन्हें ही दध की मक्खी की तरह निकाल दिया था। बहरहाल, दोनों नेताओं के बीच बातचीत शुरू हो गई है। इसलिए देर-सबेर नरेंद्र सिंह की जदयू में वापसी भी हो ही जाएगी। नीतीश के लिए यह मजबूरी भी है। पिता के जदयू में आ जाने से सुमित सिंह भी पार्टी में शामिल हो जाएंगे। इससे जहां विधानसभा में विधायकों की संख्या बढ़ जाएगी, वहीं बतौर निर्दलीय वह दबाव की राजनीति भी नहीं कर पाएंगे।

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