एनडीए में है चल रही है दो पीढ़ियों की लड़ाई

दयानाथ, पटना। बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। सिर पर विधानसभा चुनाव होने के बावजूद इसके घटक दलों में रोजाना दोतरफा तरीके से खटास बढ़ रही है। बाहरी स्तर पर एक-दूसरे के साथ शक्ति प्रदर्शन से, तो खुद घटक दलों के अंदर। इसलिए कि बिहार में राजग के दो सबसे मजबूत घटक दलों- भाजपा और जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व ही नहीं है। इसकी तीसरी पार्टी- लोक जनतांत्रिक पार्टी (लोजपा)- इस मायने में थोड़ा भाग्यशाली है कि परिवारवाद से ही सही, लेकिन रामविलास पासवान के बाद नेतृत्व के लिए चिराग हैं। इसके उलट बिहार भाजपा में जहां ज्यादा जोगी मठ उजार चल रहा है, वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू में पहले से दसवें नंबर तक वे खुद हैं। इस तरह एनडीए का संकट दरअसल दो पीढ़ियों का संघर्ष हो गया है। कम-अधिक सीटों पर बात जो भी हो, लेकिन यह संघर्ष अब चुनाव बाद तक चलता ही रहेगा। इसे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल की इस पीड़ा से आसानी से समझा जा सकता है कि अगर रामविलास पासवान स्वस्थ रहते तो सब कुछ सुलट जाता। यानी भाजपा और जदयू के बुजुर्ग नेताओं का लोजपा के युवा नेता चिराग पासवान से सुर-ताल नहीं मिल रहा है। इसे दूसरे तरीके से भी कहा जा सकता है। यह कि अगर भाजपा और जदयू में नई पीढ़ी का कोई नेता चिराग से बात करता तो माहौल कुछ और ही होता।

तय मानिए चिराग का चुनाव से पहले क्या, बाद में भी गठबंधन में असहमति की आवाज आती रहेगी। अन्य पार्टियों के बुजुर्ग नेताओं और चिराग में अंतर अनेक हैं। कोरोना काल में जहां भाजपा और जदयू के नेता वर्चुअल रैली और सभाएं करते रहे, वहीं युवा चिराग ने गांव-गांव का चक्कर लगाया है। इसी आधार पर वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात-निश्चय योजनाओं पर वार करते हैं। उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की उदाहरण के साथ बात कर पाते हैं। बताते हैं कि सात निश्‍चय के सभी कार्य अधूरे पड़े रह गए हैं। भुगतान भी नहीं हुआ है। फिर भी सात निश्चय-2 के वादे किए जा रहे हैं। बिहार में अगली सरकार लोजपा की बनी तो  बिहार फर्स्‍ट, बिहारी फर्स्‍ट विजन डॉक्‍यूमेंट को लागू करेगी।

इसी में चिराग की राजनीति का मर्म। वह 2020 के बजाय 2025 के चुनाव की तैयारी की नींव अभी ही रखना चाहते हैं। इसलिए कि नीतीश कुमार के लिए उम्र के आधार पर बतौर मुख्यमंत्री यह आखिरी चुनाव माना जा रहा है। मुख्य विपक्षी दल राजद में तेजस्वी यादव का एकला चलो की राजनीति चल रही है। बेहतर चुनावी राजनीति के लिए आवश्यक लचीलापन न होने से अपनी संभावनाएं वह खुद कम लेते हैं। सोचकर देखिए, अगर तेजस्वी ने लोजपा के उस बयान को लपक लिया होता जिसमें चिराग को भावी सीएम प्रत्याशी बनाने की बात कही गई थी तो क्या होता। वह एक बार कहने को भी कह दिया होता कि राजद से तालमेल करें तो हम उन्हें सीएम प्रत्याशी बनाने को तैयार हैं। अब तक बिहार की राजनीति में सिर्फ तीन खिलाड़ी रहने का लाभ उठा रही भाजपा-जदयू के सामने राजद के अलावा चौथा खिलाड़ी आ गया होता। ऐसे में दो खिलाड़ी मिलकर तीसरे को हराने का खेल खत्म हो जाता। दोनों तरफ दो-दो खिलाड़ी होते और मुकाबला टक्कर का होता। चिराग बिहार में वही चौथा खिलाड़ी बनना चाहते हैं। इसलिए सीटों से लेकर चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों तक में वह इसी रणनीति के तहत फैसले करते रहेंगे। 

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