बिहार में सस्ते धान का महंगा खेल

आर्यांश, दरभंगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जैसी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे पंजाब के किसानों की पीड़ा की असल वजह बिहार जैसे राज्य हैं। यहां के किसान अपनी उपज इतने सस्ते में बेच देते हैं, जो वहां के बड़े किसानों को महंगा पड़ जाता है। इस विरोधाभास को इस समय सिर्फ धान के उदाहरण से समझा जा सकता है। बता दें कि केंद्र ने 2020-21 के लिए धान (कॉमन ग्रेड ) का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी 1,868 रुपये प्रति क्विंटल, जबकि धान (ग्रेड-ए) के लिए 1,888 रुपये प्रति क्विंटल तय कर रखा है। लेकिन बिहार में दरभंगा समेत तमाम जिलों में धान एमएसपी से बहुत कम कीमत पर 11 सौ- 12 सौ रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है।

मिसाल के तौर पर दरभंगा को देखें। जिले में इस बार 93 हजार हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी। इनमें से 80 प्रतिशत धान बाढ़ में बर्बाद हो गया। सहकारिता विभाग ने धान खरीदने के लिए जिले में 167 पैक्स (प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट सोसायटी) और चार व्यापार मंडलों को मंजूरी दी थी। दरभंगा में धान की खरीदी दो दिसंबर से शुरू हुई। पहले 30 हजार मीट्रिक टन धान खरीदने का लक्ष्य था। इसे बाद में कुछ और बढ़ा दिया गया। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि अभी तक महज 460 मीट्रिक टन ही खरीदारी हो पाई है। यानी लक्ष्य की तुलना में मात्र डेढ़ प्रतिशत। सरकारी खरीद का असर सीधा भाव पर पड़ता है। खरीद में तेजी से भाव में तेजी आती है। लेकिन इस साल अभी तक गति में मंदी से किसानों को बाजार में धान 11 सौ-12 सौ रुपये प्रति क्विंटल बेचना पड रहा है। कई जिले ऐसे भी हैं, जहां भाव एक हजार के भी नीचे चल रहा है। इतना ही नहीं, अगर किसान का बोरा पुराना है तो उसे प्रति खरीदने वाली एजेंसी को प्रति बोरा 25 रुपये अधिक देना पड़ता है। इस सबमें जिम्मेदार पदाधिकारियों की लापरवाही सामने आ रही है। बहरहाल, किसान अपनी मेहनत की उपज को निर्धारित सरकारी दर से 400 से 800 रुपए घाटा सहकर साहूकारों के हाथों बेचने को मजबूर हैं। किसानों की इस मजबूरी का फायदा बिचौलिये उठा रहे हैं। यहां से सस्ते में खरीदकर धान पंजाब और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में पहुंचाया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस सीजन में अभी तक सैकड़ों ट्रक धान अन्य राज्यों में भेजे जा चुके हैं। जब पंजाब जैसे राज्यों में बिहार से सस्ता धान पहुंच जाएगा, तो वहां अधिक एमएसपी पर अधिक खरीद होगी ही नहीं। नए कानून में किसानों को देशभर में कहीं भी अपनी उपज को बेचने की छूट मिल गई है। इससे पंजाब जैसे राज्यों के व्यवसायियों को बिहार आदि राज्यों से धान खरीदना सस्ता पड़ता है।

धान जल्दी और सस्ते में बेचने के कई कारण हैं। सबसे पहला होता है गेहूं की खेती। धान कटते ही गेहूं की खेती शुरू हो जाती है। उसके लिए ट्रैक्टर से जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक और सिंचाई की व्यवस्था करनी होती है। इन सबके के लिए काफी पैसे की जरूरत होती है। इस पैसे के लिए धान को सस्ते में और जल्दी बेचना किसानों की मजबूरी होती है। सरकारी खरीद का फैसला होने में देरी भी इसका बड़ा कारण है। ऐसे में घाटे के बावजूद निजी व्यापारियों के हाथों धान बेचना ही पड़ता है। दरभंगा जिले में ही गंगदह-शिवराम समेत कई ऐसी पंचायतें हैं, जहां पैक्स और व्यापार मंडल जैसी एजेंसियों ने धान की खरीद शुरू ही नहीं की है। जबकि किसानों को गेहूं की खेती के लिए पैसा जल्दी चाहिए था।

किसानों के सरकार के भरोसे नहीं रहने के कई कारण हैं। जैसे, यहां मौसम के कारण इस समय धान में नमी रहती है। सरकार 17 प्रतिशत तक नमी वाले धान की ही खरीद समर्थन मूल्य पर करती है। लेकिन राज्य में इस समय नमी 20 प्रतिशत के आसपास है। नमी की बाधा इसलिए आती है, क्योंकि सरकारी एजेंसियों के पास उसे सुखाने का इंतजाम नहीं होता। ऐसे में किसानों का धान क्रय केंद्र वाले नहीं लेते हैं। जो क्रय केंद्र उदारता दिखाते हुए धान खरीद लेते हैं, तो वहां भी उनका दोहन होता है। नमी अधिक बताकर धान की मात्रा घटा दी जाती है। केंद्र नमी में जो दो प्रतिशत छूट देता है, वह इस साल अभी तक नहीं मिला है।

सूत्र बताते हैं कि धान खरीद में उदासीनता के पीछे साहूकारों और पदाधिकारियों की मिलीभगत रहती है। पैक्सों और व्यापार मंडलों में जितनी देरी से धान की खरीद होती है, किसान उतने मजबूर होते हैं। तब वे खुले बाजार में 1000 से लेकर अधिकतम 1500 रुपए प्रति क्विंटल तक धान बेच देते हैं। उसके बाद वही साहूकार पैक्स और व्यापार मंडल के माध्यम से बिक्री दिखा कर 400 से 800 रुपए प्रति क्विंटल के मुनाफे से अपनी जेब भर लेते हैं। इसमें बिचौलियों की बड़ी सांठगांठ होती है। यही बिचौलिए पदाधिकारियों से मिलकर किसानों की मेहनत की कमाई ऊपर-ऊपर पी जाते हैं। और, किसान अपनी किस्मत को रोता रह जाता है।

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