मंत्री विजेंद्र यादव समेत 28 विधायकों पर लटकी तलवार, नजर पटना हाईकोर्ट पर

पटना। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नए कार्यकाल में मुसीबतें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। पहले तारापुर के जदयू विधायक मेवालाल चौधरी को विवादों के कारण दो दिन में ही शिक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था। अब ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव संकट में पड़ गए हैं। सुपौल से उनके निर्वाचन को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। उन पर अपने नामांकन पत्र में कई जानकारियां छिपाने का आरोप लगा है। इस तरह बिहार विधानसभा के नवनिर्वाचित विधायकों में से 28 का मामला हाई कोर्ट में पहुंच गया है। बाकी 27 ने गलत मतगणना से लेकर साजिश करके हराने तक का आरोप लगाया है। ये सारे बहुत कम वोटों से हार हुए नेता हैं। अदालत की शरण लेने वाले पराजित प्रत्याशियों में से 21 विपक्षी महागठबंधन के हैं। बाकी सत्ता पक्ष के हैं। बताया जा रहा है कि इन याचिकाओं पर पटना हाई कोर्ट अवकाश खत्म होने के बाद चार जनवरी को सुनवाई कर सकता है। ऐसे में सबकी धड़कनें तेज हो गई हैं।

ताजा मामला सुपौल विधानसभा सीट का है। यहां से 1990 से यानी 30 वर्षों से लगातार जीतते आ रहे ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव के निर्वाचन को चुनौती दी गई है। इसके लिए निर्दलीय उम्मीदवार रहे अनिल कुमार सिंह ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। इसके मुताबिक, बिजेंद्र प्रसाद यादव ने अपने नामांकन पत्र में जानकारियां छुपाई हैं। अनिल सिंह में नामांकन पत्रों की जांच के समय इस पर आपत्ति दर्ज कराई थी। आरोप है कि सुपौल के निर्वाचन पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी ने इस पर उचित निर्णय लेते हुए आदेश नहीं दिया। इस सिलसिले में उन्होंने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सभी जानकारी हासिल कर ली है। उसी के आधार पर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका के मुताबिक, नामांकन के समय बिजेंद्र यादव की तरफ से जमानत की पूरी राशि भी जमा नहीं की गई थी। इतना ही नहीं, उसके साथ शपथपत्र में अर्जित संपत्ति और देनदारी का पूरा ब्योरा भी नहीं है। एक गैर सरकारी संस्था का अस्थायी सदस्य होने के बावजूद इसकी जानकारी नहीं दी गई। जबकि उस गैर सरकारी संस्था पर सरकार का लाखों रुपये का बकाया है।

इसी तरह उनके पटना स्थित सरकारी आवास बिजली कनेक्शन का 5,61,316 रुपये बकाया हैं। जबकि नामांकन पत्र में बिजली का बकाया शून्य बताया गया है। इतना ही नहीं, अपराध के संबंध में जानकारी दिए जाने वाले कॉलम को भी खाली छोड़ दिया गया। यह बिहार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 का उल्लंघन है। अगर याचिका में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो बिहार सरकार के वरिष्ठ मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव की मुसीबत बढ़ सकती है।

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