बधाई हो, नियुक्ति घोटाले के आरोपी बन गए शिक्षा मंत्री

सारांश, पटना। साहित्यकार और चिंतक निर्मल वर्मा ने लिखा है-आदमी जिसका विरोध कर रहा होता है, दरअसल वह उसे ही पाना चाहता है। मंगलवार को मेवालाल चौधरी को बिहार का शिक्षा मंत्री बना दिए जाने के बाद दरअसल ऐसा होता लगता भी है। नहीं तो जो नीतीश कुमार चुनाव के दौरान क्राइम, करप्शन और कम्यूनलिज्म से कभी समझौता नहीं करने की बात करते थे, भला उनका ही ऐसा फैसला कैसे हो जाता। जी हां, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिन्हें शिक्षा मंत्री बनाया है दरअसल वह बिहार के सबसे बड़े नौकरी घोटाले के आरोपी हैं। उनके खिलाफ कभी भ्रष्टाचार के आरोप में एफआईआर तक दर्ज हो चुकी थी। इसी आरोप में नीतीश कुमार उन्हें एक बार पार्टी से भी निकाल चुके हैं। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बिहार का राज्यपाल रहते मेवालाल चौधरी के खिलाफ जांच भी कराई थी, जिसमें वह दोषी पाए गए थे। यह जांच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर हुई थी।

बता दें कि मेवालाल चौधरी पर सबौर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति रहते नौकरी में भारी घोटाला करने का आरोप है। यह घोटाला 161 सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति में हुआ था। इसी दौरान उन पर भवन निर्माण में भी घोटाले का आरोप है। कृषि विश्वविद्यालय में 2012 में हुई 161 सहायक प्राध्यापक सह जूनियर साइंटिस्टों की नियुक्ति में बड़े पैमाने पर हुई धांधली सामने आई थी। यूनिवर्सिटी में योग्य के बजाय अयोग्य लोगों की नियुक्ति कर ली गई थी। धांधली भी इतनी बड़ी हुई कि यूनिवर्सिटी ने बगैर राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) पास किए डेढ़ दर्जन अभ्यथियों को नौकरी दे दी। मेवालाल चौधरी के खिलाफ पहले सबौर थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई। इसमें उन्हें मुख्य अभियुक्त बताया गया। इसके बाद मामला निगरानी विभाग के हवाले कर दिया गया। निगरानी विभाग ने मेवालाल के खिलाफ केस दर्ज करने में देरी की। किसी तरह 2017 में केस दर्ज हुआ। तबसे तीन साल से ज्यादा हो गये, लेकिन मेवालाल के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। कहा जाता है कि मेवालाल चौधरी की राजनीतिक ताकत को देखते हुए निगरानी विभाग कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

अचरज की बात यह कि मेवालाल चौधरी के घोटाले के खिलाफ जदयू के नेताओं ने भी आवाज उठाई थी। विधान परिषद में जदयू के विधान पार्षदों ने भारी हंगामा किया था। वहीं बाद में भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने भी उठाया था। सुशील कुमार मोदी तो सबूतों का पुलिंदा लेकर तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोबिंद से मिलने चले गए थे। इसके बाद हुई जांच में पाया गया कि मेवालाल चौधरी ने कृषि विश्वविद्यालय का कुलपति रहते बड़ा घोटाला किया है। लेकिन नीतीश से नजदीकी के कारण मेवालाल चौधरी बच गए। मेवालाल चौधरी की मुख्यमंत्री से नजदीकी इसी से समझी जा सकती है कि जब भागलपुर के सबौर में कृषि कॉलेज को नीतीश सरकार ने विश्वविद्यालय का दर्जा दिया तो पहला कुलपति उन्हें ही बनाया गया था। मेवालाल चौधरी जब रिटायर हुए तो नीतीश कुमार ने 2015 में तारापुर विधानसभा क्षेत्र से उनको जदयू का टिकट दे दिया। वह जीत भी गए। उसी सीट से इस बार दोबारा चुन कर आए और शिक्षा मंत्री बन गए। गौरतलब है कि 2010 में मेवालाल जब कुलपति बने तो पत्नी नीता चौधरी जदयू से विधायक बनीं। लेकिन नियुक्तियों में हुई गड़बड़ी और राजभवन से प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मामला तूल पकड़ लिया। इससे नीतीश कुमार ने चौधरी को जदयू से निकाल दिया था। अब 2020 के फिर से विधायक बनते ही सब शुभ मंगल है।

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