बीजेपी ने छह विधायक नहीं, जदयू के राष्ट्रीय पार्टी बनने का सपना तोड़ा है

आर्यांश, पटना। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को शायद अपने अलावा और किसी मित्र दल का सपना नहीं सुहाता है। महाराष्ट्र में पहले शिवसेना को खत्म करना चाहा, तो अब बिहार में जनता दल-यूनाइटेड यानी जदयू का नंबर लगा दिया। पिछले कुछ सालों का अनुभव यही कहता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने जब-जब राष्ट्रीय पार्टी बनने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, तब-तब उसे लंगड़ी मारकर गिरा दिया गया है। ताजा मामला अरुणाचल प्रदेश का है। सूत्रों के मुताबिक, जदयू अरुणाचल में अपने सात में से छह विधायकों के बीजेपी में चले जाने से परेशान नहीं है। वह इससे दुखी है कि क्षेत्रीय से राष्ट्रीय पार्टी बनने की उसकी कोशिशों को झटका सहयोगी बीजेपी ने दिया है। उसे राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में अनिवार्य छह प्रतिशत वोट चाहिए। ऐसे में बिहार के बाद अरुणाचल में ही जदयू को छह प्रतिशत से अधिक वोट हासिल था। लेकिन छह विधायकों के पाला बदल लेने से ऐसा नहीं रह सका। अब उम्मीद पश्चिम बंगाल चुनाव से है।

जदयू को ऐसा ही झटका पिछले साल झारखंड विधानसभा चुनाव में लगा था। पार्टी वहां बीजेपी से अलग होकर 81 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इसी उम्मीद से कि राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए जरूरी छह प्रतिशत वोट एक और राज्य में हासिल किए जा सकें। ताकि बिहार और अरुणाचल प्रदेश के बाद तीन राज्यों में प्रदर्शन ठीक हो सके। लेकिन ऐसा हो ना सका। इसमें रंग में भंग कर डाला चुनाव आयोग ने। उसने राज्य में पहले से ही मौजूद समान चुनाव चिह्न के आधार पर जदयू को नए चुनाव चिह्न पर लड़ने का आदेश दे दिया। बता दें कि जदयू का चुनाव चिह्न तीर है। इससे अलग चुनाव चिह्न पर लड़ने से झारखंड में मिले वोट जदयू के खाते में गए ही नहीं। तब चुनाव आयोग के प्रति गुस्सा भी बीजेपी को झेलना पड़ा था। तब चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर जदयू में ही थे। उन्होंने बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ने तक की तैयारी कर ली थी। इसके बाद ही बीजेपी नेताओं ने शब्दों को तीर चलाने शुरू कर दिए थे। तब नौबत गठबंधन टूटने तक आ गई थी, जो अमित शाह के दखल देने से बच गया।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हमेशा से जदयू को राष्ट्रीय पार्टी बनाने की महत्वाकांक्षा रही है। इसीलिए वह जदयू को अलग-अलग राज्यों में जब-तब अकेले चुनाव लड़ाते रहे हैं। ताकि राष्ट्रीय पार्टी बनने की दूसरी ही शर्त पूरी की जा सके। नियमों के मुताबिक अगर चार राज्यों में भी क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाए तो वह राष्ट्रीय पार्टी हो जाएगी। जब तक अरुणाचल प्रदेश में टूट नहीं हुई तो बिहार के साथ दो राज्यों में यह दर्जा हासिल था। बस दो की ही कमी थी। यह आसान था। लेकिन अब अरुणाचल में भी एक ही विधायक रह जाने से क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा भी जा सकता है। तब तीन राज्यों की कमी हो जाएगी। जदयू को गुस्सा इसी बात पर है कि सहयोगी बीजेपी इसमें मदद करने के बजाय बाधा ही डाल रही है। लेकिन सत्ता की मजबूरी ऐसी है कि नीतीश कुमार बीजेपी से दूर भी नहीं जा सकते हैं। ऐसे में रही सही उम्मीद पश्चिम बंगाल पर आकर टिक गई है। जदयू को छह फीसदी जरूरी वोट पाने के लिए अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना ही होगा।

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