भाजपा से 22 तो जदयू से 12 मंत्री होंगे, गिरिराज को डिप्टी सीएम बनाने का दबाव नहीं मानेंगे नीतीश

आर्यांश, पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा अधिक सीटें जीतकर भी एक ऐसे चौराहे पर पहुंच गई है, जहां से कोई राह उसे मंजिल तक ले जाती नजर नहीं आ रही। किसी भी गठबंधन में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी सरकार का मुखिया होता है। चाहे वह केंद्र का मामला हो या राज्य का। लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हो रहा। एनडीए में दूसरे नंबर पर रही पार्टी जदयू के नेता नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे। वह 16 से 18 नवंबर के बीच शपथ ले सकते हैं। इसकी तैयारी भी शुरू हो गई है। दिल्ली-पटना के बीच मोबाइल पर लंबी-लंबी बातचीत चल रही है। जिस चिराग से भाजपा की राह में रोशनी फैलाने की उम्मीद थी, वह बुझ चुका है। इसलिए उसने जमीनी हकीकत को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही एनडीए के चलने पर मुहर लगा दी है। बाकी फिल्डिंग छोटे मोदी यानी सुशील मोदी पटना में सजा रहे हैं। इसमें एक ही पेंच फंसा है। वह है दिल्ली में गृह मंत्रालय में बैठा थर्ड अंपायर। उसे यह अब भी मंजूर नहीं कि 2015 से राज्य में अपना मुख्यमंत्री देखने का सपना एक बार फिर अधूरा रह जाए।
इस बीच, पटना में एनडीए में शामिल सभी दलों के विधायक दल की अलग-अलग बैठक हो रही है। बाद में संयुक्त विधायक दल की बैठक होगी, जिसमें नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री चुना जाएगा। एनडीए सूत्रों के मुताबिक, संख्या बल के आधार पर भाजपा से 22 तो जदयू से 12 मंत्री बनना तय हुआ है। एक-एक मंत्री सहयोगी वीआईपी हम पार्टी से बनेंगे। वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी खुद मंत्री बनना चाहते हैं। हालांकि वह चुनाव हार गए हैं। किस दल से किन्हें मंत्री बनाना है, इस पर जहां-तहां बैठकें चल रही हैं। भाजपा इस बार विधानसभा अध्यक्ष का पद भी चाहती है, लेकिन जदयू इस मूड में कतई नहीं है। सदन की ताजा स्थिति को देखकर इस बार विधानसभा अध्यक्ष का पद वह किसी और को देने का जोखिम नहीं उठा सकती। पिछली बार भी जदयू के विजय कुमार चौधरी ही स्पीकर थे। इतना ही नहीं, बड़े भाई के नाते भाजपा इस बार एक नहीं बल्कि दो उपमुख्यमंत्री भी चाहती है। ये दो नाम हैं- गृह मंत्रालय में अमित शाह के डिप्टी नित्यानंद राय और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह। इसके लिए निवर्तमान उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को कुर्बानी देनी पड़ सकती है। अगर ऐसा हो गया तो वह भी घाटे में नहीं रहेंगे। केंद्र से पटना आने वाले मंत्रियों से जो रिक्त स्थान बनेगा, वह उसकी पूर्ति करेंगे। या कहीं राज्यपाल भी बनाए जा सकते हैं। सुशील मोदी को पटना से निकालने की कोशिश की एक और बड़ी वजह है। वह यह कि बिहार में नीतीश कुमार के सबसे करीबी वह और नंदकिशोर यादव हैं। यही कारण है कि लगातार आठवीं बार चुनाव जीतने के बावजूद नंदकिशोर यादव का नाम कहीं नहीं लिया जाता। दूसरे, भाजपा का अब मानना है कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय को डिप्टी सीएम बनाने से राजद के कट्टर समर्थक यादवों को तोड़ा जा सकता है। इसी तरह गिरिराज सिंह को भी डिप्टी सीएम बनाकर बिहार के नाराज चल रहे सवर्ण मतदाताओं को खुश किया जा सकता है। सवर्णों की लंबे समय से ऐसी मांग रही भी है। लेकिन उससे पहले नीतीश कुमार इस दूसरे नाम से नाराज हो गए हैं। गिरिराज सिंह उन्हें अपनी सरकार में कतई कबूल नहीं हैं। गिरिराज सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल करने से जो थोड़े-बहुत मुस्लिम वोट मिलते हैं, वे भी बंद हो जाएंगे। फिर उनकी अपनी सेक्लुयर छवि तार-तार हो जाएगी। नीतीश को जानने वालों को पता है कि जब छवि की बात आती है तो वह कुछ दूसरा नहीं सोचते।

सूत्रों के मुताबिक, हम पार्टी के नेता जीतनराम मांझी का यह बयान इसी रणनीति के तहत आया है कि वह मंत्री नहीं बनेंगे। बता दें कि मांझी पहले जदयू में ही थे और नीतीश कुमार के बेहद करीबी थे। इतने कि कुछ दिनों के लिए नीतीश ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया था। इस बार के चुनाव में उनकी पार्टी को चार ही सीटें मिली हैं, लेकिन वह 24 के बराबर हैं। अगर वह किसी भी वजह से एनडीए से निकल जाते हैं तो विपक्षी महागठबंधन के पास विधायकों की संख्या 119 हो जाएगी। इनमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम को पांच विधायक भी होंगे। विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है। जाहिर, मांझी का पाला बदल भारी तनाव पैदा कर देगा। इसे समझते हुए.भाजपा के दो बड़े नेताओं ने उनसे बंद कमरे में मुलाकात की है। ये दोनों हैं स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय और प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल। लेकिन जदयू सूत्र मांझी वाले मामले का दूसरा पहलू समझाते हैं। उनका कहना है कि अगर भाजपा ने अपने दो नेताओ को डिप्टी सीएम बनाने पर जोर डाला तो नीतीश कुमार अंत में मांझी को उपमुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर देंगे। उनका विरोध कर भाजपा दलितों और और अतिपिछड़ों को नाराज करने का साहस नहीं जुटा पाएगी। हालांकि इस पद की सबसे अधिक उम्मीद वीआईपी नेता मुकेश सहनी को थी। यही पद पाने के लिए उन्होंने विपक्षी महागठबंधन को छोड़ा था, लेकिन खुद चुनाव नहीं जीत पाने से सारे मंसूबे धरे रह गए। अब तो उनके विधायकों के किसी भी दिन भाजपा में शामिल हो जाने की आशंका जताई जा रही है। गौरतलब है कि विधानसभा की 243 सीटों पर हुए चुनाव में एनडीए ने 125 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत प्राप्‍त कर लिया है। विपक्षी महागठबंधन को इस चुनाव में 110 सीटें हासिल हुई हैं। भाजपा को 74, जदयू को 43, राजद को 75, कांग्रेस को 19 सीटें प्राप्‍त हुई हैं। भाकपा- माले को 12 और अन्‍य के खाते में आठ सीटें गई हैं।

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