बिहार में 16 सीटों से वामपंथियों को मिली संजीवनी

पटना। इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव वामपंथी पार्टियों के लिए संजीवनी साबित हुआ। विपक्षी महागठबंधन के तहत मात्र 29 सीटों पर चुनाव लड़ने पर भी तीन वाम दलों ने कुल 16 सीटों पर लाल झंडा फहरा दिया। मात्र 19 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाकपा (माले) ने सबसे अधिक 12 जीती हैं। जबकि भाकपा और माकपा के हिस्से दो-दो सीटें आईं। इस तरह बिहार में वामपंथी दलों की स्ट्राइक रेट 80 प्रतिशत रही। इस जीत का महत्व आज के हालात में बिहार से अधिक पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बढ़ गया है। इसे माकपा महासचिव सीताराम येचुरी स्वीकार भी करते हैं। इसलिए कहा कि वाम दलों को खारिज करना गलत साबित हुआ। गौरतलब है कि महागठबंधन में तीनों प्रमुख वाम दलों को चुनाव लड़ने के लिए 29 सीटें दी गई थीं। इनमें से भाकपा (माले) ने 19, भाकपा ने छह और माकपा ने चार सीटों पर चुनाव लड़ा था।

माकपा नेता सीताराम येचुरी और भाकपा (माले) के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य को मलाल है कि उन्हें कांग्रेस की तरह अधिक सीटें क्यों नहीं दी गईं। अगर कांग्रेस और वामपंथियों को 50-50 सीटें भी मिल गई होतीं, तो परिणाम कुछ और होता। बता दें कि महागठबंधन में राजद के बाद सबसे अधिक 70 सीटें कांग्रेस को दी गई थीं, जिनमें से वह 19 ही जीत पाई। लेकिन सवाल उठता है कि वामपंथियों की यह सफलता क्या अपने बूते रही? ऐसा लगता नहीं। इसलिए कि अगर ऐसी क्षमता थी तो बिहार में पहले कभी इतनी सफलता क्यों नहीं मिली? दरअसल यह दो वोट बैंकों के मिलन का असर है। कहना ही होगा कि कांग्रेस के विपरीत तीनों वामपंथी दल कैडर-आधारित हैं। इसलिए इनका अपना छोटा ही सही, लेकिन ठोस बैंक है, जिससे महागठबंधन की संख्या तीन अंकों में पहुंच पाई। वामपंथियों खासकर भाकपा (माले) का नक्सल प्रभावित भोजपुर क्षेत्र में बढिया आधार कायम है। इसी तरह बेगूसराय और उसके आसपास भाकपा और माकपा का हमेशा से असर रहा है। बेगूसराय को तो कभी बिहार का लेनिनग्राद तक कहा जाता था। समय के साथ यहां भी वामपंथी आंदोलन कमजोर पड़ता गया और अब बिना किसी गठबंधन में शामिल हुए चुनावी सफलता मुश्किल से मिलती है। ऊपर से आपस में भी अक्सर लड़ते-झगड़ते हुए अलग-अलग ही चुनाव लड़ते थे। डेड़-दो दशक पहले जिस माकपा का वोट प्रतिशत डेढ़ से दो हुआ करता था, उसे इस बार दो सीटें जीतने में सफलता मिली है। यहां याद दिला दें कि 1995 में बिहार विधानसभा में वामपंथी दलों के 30 से अधिक विधायक हुआ करते थे। इतना ही नहीं, 1972 में भाकपा 35 विधयाकों के कारण विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल बनी थी। लेकिन इमरजेंसी का समर्थन करने के कारण 1977 में हुए चुनाव में वामपंथी विधायकों की संख्या घटकर 25 रह गई। और, 2015 में वामपंथी दलों को सिर्फ तीन ही सीटें जीतने में सफलता मिली थी। ये तीनों ही सीटें भाकपा (माले) ने जीती थीं। 2005 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों की सीटें नौ रहीं, जबकि 2010 में बची-खुची सीटें भी चली गई थी। ऐसे में भाकपा माले, माकपा और भाकपा को मिली जीत से बिहार में वामपंथ को फिर से खड़ा होने की ताकत यकीनन मिलेगी।

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