…तो चिराग तले अंधेरा

अंशुमान, पटना। कोर्ट-कचहरी और राजनीति सीखने में समय लगता है। इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव लोजपा नेता चिराग पासवान को बहुत कुछ सिखा रहा है। भाजपा नेताओं को बता कर अकेले चुनाव लड़ने वाला उनका बयान उन पर ही भारी पड़ रहा है। उनके इस बयान ने भाजपा को भी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। 2015 के चुनाव से भाजपा के जो रणनीतिकार जदयू को कमजोर करने की इच्छा रखते रहें हैं, वे भी बदले हालात में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से संबंधों को बदतर स्थिति में ले जाने के पक्ष में नहीं हैं। जाहिर तौर पर इस नई रणनीति का सर्वाधिक असर लोजपा पर पड़ेगा। ऐसे में चुनवा बाद सरकार बनाने में लोजपा की जरूरत ही अब इस पार्टी का भविष्य तय करेगी। इस बीच, खुद उनके परिवार से ही उनसे अलग राय भी आने लगी है। रामविलास पासवान के भाई पशुपतिनाथ पारस ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा की है। बता दें कि लोजपा ने दरभंगा में गौड़ाबौराम से राजीव कुमार ठाकुर और दरभंगा ग्रामीण से प्रदीप कुमार ठाकुर को प्रत्याशी बनाया है।

चिराग ने अकेले चुनाव लड़ने के सिलसिले में वरिष्ठ भाजपा नेता नित्यानंद राय, राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन और रामकृपाल यादव का खासतौर पर नाम लिया था। इसलिए शुक्रवार को सबसे पहले प्रदेश भाजपा के नेता और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने सबसे पहले उन्हें फटकार लगाई। कहा कि लोजपा को दो सीटें भी नहीं आने वाली। वह प्रधानमंत्री और अन्य भाजपा नेताओं का नाम लेकर कतई भ्रम ना फैलाएं। सुशील मोदी ने लोजपा के एनडीए में होने से भी इंकार कर दिया। इस पर चिराग ने शायराना अंदाज में जवाब दिया। कहा, नीतीश सरकार की वापसी असंभव है। इस पर शाम होते-होते केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता प्रकाश जावड़ेकर आक्रामक होकर मीडिया से मुखातिब हो गए। उन्होंने चिराग और उनकी पार्टी को बोटकटवा तक कह दिया। सुशील मोदी की वह बात भी दोहरा दी कि एनडीए में अब लोजपा नहीं है। एनडीए में सिर्फ पार्टियां हैं-भाजपा, जदयू, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और जीतनराम मांझी की हम।

बता दें कि लोजपा के पीएम मोदी के नाम पर अलग ताल ठोकने के बाद जदयू की निगाह में भाजपा संदेह के घेरे में थी। लोजपा की अलग चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद कई भाजपा नेताओं के पाला बदलने से जदयू का संदेह और पुख्ता हुआ। इस कारण शुरुआती दौर में दोनों दलों के बीच खटपट भी हुई। अब भाजपा इस संदेह को दूर करने में जुट गई है। इसके तहत पीएम मोदी और नीतीश की साझा रैलियां, साझा घोषणापत्र जारी करने की तैयारी शुरू हो गई है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा की रणनीति में बदलाव की बड़ी वजह समर्थक वोटों में बंटवारे का डर है। असल में चिराग का एक सूत्रीय एजेंडा पीएम मोदी के नाम पर वोट मांगने का है। इसके अलावा कुछ दिनों पूर्व उन्होंने विपक्षी महागठबंधन के सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव की तारीफ की थी। ऐसे में यह संदेश गया कि चिराग विपक्षी वोट हासिल करने के बदले राजग के वोटों में बिखराव की स्थिति पैदा कर सकते हैं। भाजपा और जदयू के बीच दूरी के कारण भाजपा को 12 फीसदी कुर्मी-कुशवाहा वोटरों के नाराज होने का डर सता रहा है। इसके अलावा नीतीश की महादलितों और कुछ अति पिछड़ी जातियों में भी पैठ है। जाहिर है, लोजपा के मामले में जारी खींचतान से नीतीश के समर्थक जातियों में नाराजगी पैदा हो सकती है।

सूत्रों के मुताबिक, विधानसभा चुनाव के बाद लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान को तीन लक्ष्य हासिल करने हैं। पहला -अपनी मां को राज्यसभा भेजना। दूसरा, केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपने पिता की जगह शामिल होना और तीसरा- पार्टी की विरासत मामले में अपने नाम पर अंतिम मुहर लगवाना। जाहिर तौर पर चिराग अपना तीनों लक्ष्य तभी हासिल कर पाएंगे जब वह चुनाव के बाद राजग की विकल्पहीन जरूरत बने रहें। मतलब लोजपा के बिना राजग वहां सरकार नहीं बना पाए। इसके उलट स्थिति में चिराग के लिए तीनों लक्ष्य को भेदना मुमकिन नहीं रहेगा। जदयू किसी कीमत पर राज्यसभा भेजने के मामले में इस बार मदद नहीं करेगी, जबकि विरासत के सवाल पर पार्टी में अलग से जंग छिड़ेगी। रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग को जहां सहानुभूति की आस है, वहीं यदि चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा, तो दिल्ली के साथ-साथ बिहार में भी नुकसान की आशंका बलवती हो सकती है।

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