बिहार में जल्द आ गई सरकार चलाने की चुनौती, मंत्री पद के दावेदारों का बढ़ा दबाव

आर्यांश, पटना। विधानसभा में किसी तरह जुट गए संख्या बल पर नीतीश कुमार के लिए सरकार बनाना आसान रहा, लेकिन चलाना कठिन साबित हो रहा है। तिस पर शिक्षा मंत्री बनाए गए मेवालाल चौधरी के इस्तीफे ने और बैकफुट पर डाल दिया है। वैसे 23 नवंबर से शुरू होने वाले विधानमंडल सत्र में नीतीश कुमार आसानी से बहुमत साबित कर देंगे। भाजपा के वरिष्ठ नेता और सुशील मोदी के बाद करीबी रह गए नंदकिशोर यादव को आसानी से विधानसभा अध्यक्ष भी बनवा लेंगे। परेशानी 27 नवंबर को सत्र की समाप्ति के बाद शुरू होने वाली है। वह है मंत्रिमंडल के दूसरे विस्तार की परेशानी।

इस समय शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री समेत 14 मंत्री हैं। इनमें भाजपा से सात, जदयू से पांच और वीआइपी और हम से एक-एक हैं। यहां वीआईपी के मंत्री भाजपा कोटे में शामिल हैं तो हम के मंत्री जदयू कोटे से। विधानसभा चुनाव के दौरान भी इन दोनों सहयोगी पार्टियों को सीटें भाजपा और जदूय ने अपने-अपने हिस्से से दी थीं। नीतीश मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में मंत्री बनने से जदयू और भाजपा के कई दिग्गज नेता रह गए थे। इसलिए राजनीतिक, सामाजिक और सबसे बढ़कर जातिगत संतुलन के लिए भाजपा और जदयू में भीतर ही भीतर दबाव बढ़ रहा है। अब जो विस्तार होना है, उसमें सिर्फ भाजपा और जदयू से मंत्री बनाए जाएंगे।

बता दें कि विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या 243 के आधार पर राज्य में अधिकतम 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं। और, एनडीए में दावेदार हैं 125 विधायक। संख्या बल के आधार पर जदयू से कुल 14 और भाजपा कोटे से 22 मंत्री बनाने की बात तय हुई है। विधानसभा में एनडीए के कुल 125 में से भाजपा के 74 विधायक हैं, जबकि जदयू के 43 ही हैं। चार-चार विधायक हम और वीआईपी से हैं। दोनों के चार-चार विधायकों में से एक-एक मंत्री बनने हैं, जो बन चुके हैं। ऐसे में भाजपा के कोटे से वीआईपी के एक मंत्री कम कर देने से कुल 21 मंत्री ही बन सकते हैं। इसी तरह हम के एक मंत्री कम कर देने से जदयू कोटे से 13 ही। चूंकि भाजपा से दो उपमुख्यमंत्री समेत सात मंत्री बन चुके हैं, इसलिए 13 मंत्री अभी और बन सकते हैं। इसी तरह इस समय मुख्यमंत्री समेत जदयू के पांच मंत्री हैं, लिहाजा पार्टी से आठ मंत्री और बन सकते हैं। कहना ही होगा राजनीतिक कारणों से ये सारे मंत्री पद नहीं भरे जाएंगे। देर-सबेर कुछ विधायक इधर-उधर होंगे ही। कांग्रेस में टूट कराने के लिए भी कुछ मंत्री पद खाली रखे जाएंगे। इस तरह अधिकतम 30 से 32 ही मंत्री ही बनाए जाएंगे।

इन रिक्त स्थानों के लिए लाइन बहुत लंबी है। जदयू में मंत्री पद के दावेदारों में कई बड़े नाम हैं। जैसे- दामोदर राउत, महेश्वर हजारी, श्रवण कुमार, संजय झा और नीरज कुमार। इसके अलावा चकई से निर्दलीय विधायक सुमित सिंह भी हैं, जिन्हें मंत्री बनाने का आश्वासन दिया गया है। इसी तरह भापा की सूची में प्रेम कुमार, नितिन नवीन, नीतीश मिश्र, पवन यादव, प्रमोद कुमार, नवल यादव और सम्राट चौधरी जैसे दावेदार हैं। इनके अलावा कई छुपे रुस्तम भी हो सकते हैं, अन्य कारणों से मंत्री बन सकते हैं। जैसे पूर्व मुख्यमंत्री सुशील मोदी के करीबी और दरभंगा शहर से पांचवीं बार विधायक बने संजय सरावगी। दूसरे, नीतीश सरकार में इस बार कोई मुसलमान मंत्री नहीं है। एनडीए से कोई मुस्लिम विधायक ही नहीं जीता है। सामाजिक समीकरणों के आधार पर एक मुस्लिम मंत्री बनना जरूरी है। भाजपा से ऐसा कोई नाम आ नहीं सकता। लिहाजा यह दबाव भी जदयू को झेलना होगा। जदयू ने 11 मुसलमान उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था, पर सब हार गए। पिछली सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहे जदयू के खुर्शीद उर्फ फिरोज भी चुनाव नहीं जीत सके। सूत्रों के मुताबिक, ऐसे में विधान परिषद से किसी मुस्लिम नेता को मंत्री बनाया जा सकता है। विधान परिषद में जदयू के पास पर्याप्त संख्या में मुसलमान एमएलसी हैं। जैसे- गुलाम रसूल बलियावी, गुलाम गौस, तनवीर अख्तर, खालिद अनवर और कमर आलम। इनमें से किसी के हाथ लाटरी लग सकती है।

सवाल यह है कि मंत्री कोई तभी बन सकता है, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार करें। सरकार के सूत्र बताते हैं कि 27 नवंबर को सत्र की समाप्ति के बाद विस्तार के लिए दबाव बन रहा है। इसलिए भी कि धार्मिक कारणों से 15 दिसंबर से 15 जनवरी तक कोई शुभ कार्य नहीं हो सकता है। इसलिए या तो पौष माह शुरू होने से पहले मंत्रिमंडल का विस्तार होगा या फिर मकर संक्रांति के बाद। नीतीश की कार्यशैली को जानने वाले यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि वह जल्दी-जल्दी मंत्रिमंडल के विस्तार के पक्ष में नहीं रहते हैं। ऐसे में 15 दिसंबर से पहले एक कोशिश जरूर होगी कि एक छोटा ही सही, लेकिन विस्तार कर लिया जाए। लेकिन यह तब तक नहीं होगा, जब तक भाजपा की ओर से दबाव ना हो। लेकिन वह काफी फूंक फूंक कर कदम रख रही है। भाजपा यह समझती है कि सरकार बना तो लिया, लेकिन चलाना इस बार आसान नहीं है। फिर भी राजनीतिक मजबूरियों से भाजपा अबकी सरकार चलाने की जिम्मेवारी से पीछे हट नहीं सकती। उसे बिहार के बाहर अच्छा संकेत देना है। खासकर पश्चिम बंगाल के लिए, जहां जल्द ही विधानसभा चुनाव है। वहां के लिए यह संदेश देना होगा कि देखो, पड़ोस में भाजपा कितनी अच्छी तरह से सरकार चला रही है। इसलिए यहां भी एनडीए की सराकर बननी चाहिए। लेकिन यह कितना आसान होगा, अभी कहना कठिन है। देखिए आगे-आगे होता है क्या।

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