क्या यह मानना चाहिए कि बदलाव के लिए बिहार जात-धर्म से ऊपर उठ गया?

अंशुमान, दरभंगा। बिहार में इस बार के विधानसभा चुनाव में कई पुरानी बातों की नई व्याख्या की जा रही है। जबकि पिछले तमाम चुनावों को देखें तो जमीन पर कुछ भी बदलता नहीं दिखता। फिर भी चुनावी पंडितों ने पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी महागठबंधन की सभाओं में जुटती भारी भीड़ को अलग चश्मे से देखा था। ठीक उसी तरह जिस तरह 2015 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के नाम पर भाजपा नेताओं की सभाओं में जुटती भारी भीड़ को एक अलग और रंगीन चश्मे से देखा गया था। दोनों के परिणाम एकदम विपरीत निकले। क्यों? इसलिए कि नया देखने के क्रम में उस जमीनी हकीकत को नहीं देखा गया, जिसे बिहार में जातिगत समीकरण कहते हैं। इस सच्चाई को तमाम पार्टियां भलीभांति जानती हैं। इसलिए टिकट बांटने का आधार भी इसे ही बनाती हैं। भले कोई बात विकास की करे या बदलाव की, इस पैटर्न और मकड़जाल को कोई तोड़ नहीं पा रहा। इसलिए फिर सवाल उठता है कि अगर राजद नेता तेजस्वी की सभाओं में जुटी भीड़ वोट में भी तब्दील होती है, तो क्या बिहार को दीमक की तरह खा रहे जात-धर्म का ढांचा ऐतिहासिक रूप से टूट रहा है? क्या कोई चुनावी पंडित यह बात दावे से कहने का साहस कर सकता है?

बिहार किसी भी हिंदी प्रदेश से कतई अलग नहीं है। बल्कि यहां तो अन्य हिंदी प्रदेशों की तुलना में जातीय समीकरण सबसे महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि सभी दलों ने जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही टिकट बांटे हैं। यह इस तथ्य को ही मजबूती से रेखांकित करता है कि यहां सबसे बड़ा चुनावी फैक्टर जाति ही है। इस कड़वे सच को भाजपा, जदयू, राजद और कांग्रेस के साथ-साथ वामपंथी और स्थानीय पार्टियां भी जमकर हवा देती हैं। इसकी वजह भी बहुत साफ है। लालू प्रसाद की पार्टी राजद हो या नीतीश कुमार की जदयू या चिराग पासवान की लोजपा- सबका गठन ही जाति के आधार पर हुआ है। इस कड़ी में राजद को सबसे आगे माना जाता है। राजद का सबसे बड़ा वोट बैंक माय यानी मुस्लिम और यादव समीकरण है, जिसकी आबादी करीब 32 प्रतिशत है। इनमें मुसलमान 18 तो यादवों की संख्या करीब 14 फीसदी हैं। ओबीसी में यादव सबसे अधिक हैं। राजद ने मुस्लिम-यादव समीकरणों पर अपनी निर्भरता को टिकट बंटवारे में ही साफ कर दिया था। 144 सीटों पर लड़ने वाली राजद ने 58 यादव प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं, जबकि 17 उम्मीदवार मुस्लिम हैं। यादव और मुस्लिम उम्मीदवार राजद में किसी भी अन्य पार्टियों से अधिक हैं। जदयू ने जहां 18 यादवों को टिकट दिया है, वहीं भाजपा 16 और जदयू ने 11 मुस्लिम मैदान में उतारे हैं। भाजपा के टिकट पर सिर्फ दो मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव लड रहे हैं। नीतीश कुमार के अति पिछड़ा ‘कार्ड’ को ध्वस्त करने के लिए तेजस्वी यादव ने 24 अति पिछड़ा (ईबीसी) उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। हालांकि इसमें जदयू उनसे आगे है। नीतीश कुमार की पार्टी ने 26 ईबीसी प्रत्याशियों को टिकट दिया है।

अन्य पार्टियों की तरह भाजपा भी जातिगत व्यवस्था पर ही निर्भर दिखती है। सवर्णों और बनियों (वैश्य) को भाजपा का वोट बैंक माना जाता है। 110 सीटों पर चुनाव लड़ रही भाजपा ने सवर्णो को 47 और 17 वैश्य उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। सवर्णों में 21 राजपूत, 15 भूमिहार और 11 ब्राह्मण हैं। इसके अलावा 16 यादव और 14 अनुसूचित जाति के उम्मीदवार भी हैं। जाति और धर्म का कार्ड खेलने में कांग्रेस भी पीछे नहीं रही है। पार्टी ने अपने परंपरागत जातिगत समीकरण को देखते हुए मुस्लिम और सवर्ण जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया है। महागठबंधन के कोटे से कांग्रेस को 70 सीटें मिली हैं। इनमें से सबसे अधिक 32 सीटों पर सवर्ण उम्मीदवारों को उतारा है। दूसरे नंबर पर मुस्लिम हैं जिनमें 10 को टिकट दिया गया है। हालांकि दस सीटें देकर उसने दलितों पर भी जोर लगाया है।

जातिगत समीकरण कैसे निर्णायक होते हैं, इसे 2015 के विधानसभा चुनाव से समझें। तब महागठबंधन ने जीत हासिल की थी। नीतीश कुमार की जदयू, लालू प्रसाद यादव की राजद और कांग्रेस ने महागठबंधन बनाकर भाजपा, आरएलएसपी और लोजपा के गठबंधन पर जीत हासिल की थी। महागठबंधन को 43 फीसदी वोट मिले। इनमें राजद को 18.4 तो जदयू को 16.8 फीसदी और कांग्रेस को 6.7 फीसदी वोट मिले थे। एक साथ रहते हुए भी तीनों को मिले अलग-अलग वोट प्रतिशत जीतिगत समीकरणों को ही बताते हैं। 2015 में एनडीए को 33 प्रतिशत वोट मिले थे। एनडीएए में तब लोजपा, उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा शामिल थे। लेकिन दो साल बाद ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन से नाता तोड़ भाजपा के साथ मिलकर फिर सरकार बना ली। वैसे नीतीश की पार्टी जदयू को कुर्मी जाति का समर्थन है। नीतीश के समर्थकों में मुसलमान के अलावा अगड़ी जातियों का काफी है। अंत्यंत पिछड़ा वर्ग तो उनका सबसे बड़ा वोट बैंक है ही। इसी तरह चिराग पासवान की दलित नेता के तौर पर पहचान है। हालांकि हम के नेता जीतन राम मांझी भी इस वर्ग के वोट बैंक पर दावा करते हैं, लेकिन उनका जनाधार लोजपा की तरह राज्यस्तरीय नहीं है।

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