10 की तर्ज पर ही चल रहा 20, पहले चरण में 54 प्रतिशत मतदान

अंशुमान, दरभंगा। कोरोनाकाल में बुधवार को बिहार विधानसभा चुनाव का पहला चरण कई मामलों में इतिहास बना गया। दुनिया में पहली बार कोरोना महामारी के बीच इतने बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष मतदान हुआ। पहले चरण में 16 जिलों की 71 सीटों पर 53.54 प्रतिशत वोट पड़े। इन सीटों पर 2015 के चुनाव में 55.11 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में इन सीटों पर 53.54 प्रतिशत वोट डाले गए थे। 2010 के विधानसभा चुनाव में इन 71 सीटों पर 50.67 प्रतिशत मतदान हुआ था। यानी इस बार 2015 के मुकाबले करीब दो प्रतिशत कम और 2010 के मुकाबले करीब तीन प्रतिशत अधिक वोट डाले गए हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, 55 सीटों पर 50 प्रतिशत या उससे अधिक वोट पड़े हैं, जबकि 16 सीटों पर 50 फीसदी से भी कम वोटिंग हुई। बांका जिले के धोरैया सीट पर सबसे ज्यादा 62.5 प्रतिशत मतदान हुआ तो भोजपुर जिले के संदेश सीट पर सबसे कम 43.8 प्रतिशत वोटिंग हुई है। इसके साथ ही 1,066 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो गई है। दूसरे चरण का चुनाव तीन नवंबर तो तीसरे चरण का सात नवंबर को है। परिणाम दस नवंबर को आएंगे।

पहले चरण में सबसे अधिक राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की सीटें दांव पर थीं। पिछले चुनाव में इन 71 सीटों में सर्वाधिक 27 सीटें राजद के खाते में गई थीं। इसके बाद जदयू को 17, भाजपा को 13, कांग्रेस कौ नौ, भाकपा माले को दो और हम व रालोसपा को एक-एक सीटें मिली थीं। जबकि मोकामा की सीट निर्दलीय के रूप में अनंत सिंह ने जीती थी, जो इस बार राजद के टिकट पर खड़े हैं। बता दें कि पिछले चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और राजद-कांग्रेस ने मिल कर चुनाव लड़ा था। फिर भी भाजपा 13 सीटें जीतने में सफल रही थी। 2020 में यानी इस बार 2010 की तरह भाजपा के साथ जदयू का गठबंधन है। 2010 में दोनों के साथ रहने से इन 71 में से 61 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। तब जदयू को 39 और भाजपा को 21 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। राजद, कांग्रेस और अन्य वाम दलों के हिस्से सिर्फ दस सीटें आई थीं। पिछले दोनों चुनावों के ये आंकड़े बताते हैं कि मैदान में प्रमुख तीन खिलाड़ियों में से जो दो साथ आ जाते हैं, वे तीसरे के लिए भारी पड़ते हैं। इससिए 2020 के परिणाम कमोबेश 2010 की तर्ज पर ही रहे तो कोई आश्चर्य नहीं।

बहरहाल, इस चरण के मतदान में तय हो गया कि कौन-सा गठबंधन आगे निकलेगा। पिछली बार के उलट इस बार फिर किसी एक पार्टी ने सरकार बनाने का दावा नहीं किया है। इसलिए गठबंधन की बात हो रही है। वह भी एक नहीं, चार बड़े गठबंधन हैं मैदान में। भाजपा, जदयू, हम और वीआईपी का गठबंधन एनडीए, राजद की अगुआई वाला महागठबंधन, हैदराबाद वाले नेता असददुद्नी ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम), रालोसपा और बसपा का ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायन्स । फिर जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन यानी पीडीए भी चुनाव मैदान में है। इसमें चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी, एमके फैजी के नेतृत्व वाली सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी यानी एसटीपीआई और बीपीएल मातंग की बहुजन मुक्ति पार्टी है। इसके बाद चिराग पासवान की लोजपा भी है जो नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के विरोध में उसके प्रत्याशियों के खिलाफ ही चुनाव लड़ रही है। कोई दल ऐसा नहीं है जो सभी सीटों पर लड़ रहा हो। पार्टियां बस ठीक-ठाक सीट के लिए लड़ रही हैं।

पिछली बार 71 में 14 सीटें ऐसी थीं, जिन पर जदयू और भाजपा के बीच ही मुकाबला था। इसमें भाजपा को नौ तो जदयू को पांच सीटों पर जीत मिली थी। लखीसराय, बाढ़, भभुआ, चैनपुर, गोह, गुरुआ, हिसुआ, वरसलीगंज और झाझा में भाजपा ने जदयू को हराया था। वहीं, अमरपुर, बेलहर, राजपुर, दिनारा और नबीनगर में जदयू का तीर भाजपा के कमल पर भारी पड़ा था। पिछले चुनाव में महागठबंधन का हिस्सा रहे जदयू की जीतन राम मांझी की पार्टी हम से पांच सीटों पर आमने-सामने की टक्कर हुई थी। इसमें जदयू चार सीट शेखपुरा, घोसी, शेरघाटी और टेकारी पर विजयी रहा था। वहीं हम महज एक सीट इमामगंज पर जदयू को हरा पाया। यह सीट जीतन राम मांझी ने उदय नारायण चौधरी को हराकर जीती थी। इस सीट पर इस बार भी दोनों आमने-सामने हैं। उधर, जदयू के खिलाफ खुली लड़ाई लड़ रही लोजपा का पिछली बार 71 में दो सीटों जमालपुर और रफीगंज पर जदयू से मुकाबला था। दोनों ही सीटों पर लोजपा की हार हुई थी।

इस बार भी दोनों गठबंधनों ने सीट बटोरने, बचाने, झपटने की जी-तोड़ कोशिश की। इसमें बड़ा पेंच फंस गया बागियों का। करीब दो दर्जन सीटें ऐसी हैं जहां वे अपना खेल बनाने के चक्कर में सबका गेम प्लान बिगाड़ने की हैसियत में हैं। इस चरण में सरकार के आठ मंत्रियों की साख भी दांव पर है। मुख्य दावेदार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन हैं। वैसे इस चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, लेकिन पहले चरण में इनमें से कोई भी मैदान में नहीं था। पिछला हिसाब-किताब देखें तो सरकार बनाने के दावेदार दोनों गठबंधनों में, सीटों के मामले में मुकाबला बराबर रहा है।

अरवल जिले में विधानसभा की तो दो ही सीटें हैं, लेकिन प्रत्याशी 42 थे। इनमें से कुर्था विधानसभा क्षेत्र में जदयू के सत्यदेव कुशवाहा हैट्रिक लगाने की कोशिश करते दिखे। वह दो बार मखदुमपुर के विधायक रह चुके हैं। जहां तक अरवल की बात है तो वहां भाजपा और भाकपा-माले में सीधा मुकाबला रहा। गया में दस सीटों पर जातिगत गोलबंदी से घमासान मुकाबला हुआ है। पिछली बार गया जिले की दस में से चार सीटें राजद को मिली थीं। जहानाबाद में तीन सीटों पर 35 प्रत्याशी थे। जिले में कई वीआईपी सीटें रहीं। इनमें जहानाबाद से मंत्री कृष्णनंदन वर्मा, मखदुमपुर से हम सुप्रीमो जीतनराम मांझी के दामाद देवेंद्र मांझी प्रमुख प्रत्याशी थे। उधर, नवादा जिले की पांच विधानसभा सीटों-हिसुआ, वारिसलीगंज, रजौली में भाजपा प्रत्याशियों ने भाग्य आजमाया तो गोविंदपुर और नवादा में जदयू उम्मीदवार थे। वहीं महागठबंधन से नवादा, गोविंदपुर और रजौली से राजद तो हिसुआ और वारिसलीगंज से कांग्रेस ने चुनाव लड़ा है। रही बात औरंगाबाद जिले की, वहां बागियों से चुनाव दिलचस्प रहा। वैसे पिछली बार जिले की छह सीटों में से महागठबंदन को पांच तो एनडीए को महज एक सीट मिली थी। लेकिन, इस बार जदयू के एनडीए में आ जाने से समीकरण पलट गया है। इसलिए एनडीए का पलड़ा भारी दिख रहा है।

पटना जिले में कुल 14 सीटें आती हैं, जिनमें से पांच पर पहले चरण में मतदान हुआ है। पांचों सीटों यानी मोकामा, बाढ़, पालीगंज, बिक्रम और मसौढ़ी में सीधी लड़ाई रही। मोकामा से अनंत सिंह, तो बाढ़ से ज्ञानेंद्र सिंह जैसे प्रत्याशियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। लगभग सभी सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला दिखा। वैसे पालीगंज में लोजपा और बिक्रम में निर्दलीय प्रत्याशी ने मुकाबले को रोचक बना दिया है। बगल में आरा जिले की सात विधानसभा सीटों पर 98 प्रत्याशियों ने किस्मत आजामाया। पिछले चुनाव में जिले में महागठबंधन की एकतरफा जीत रही थी। भाजपा को यहां एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार जदयू के राजद का साथ छोड़ देने से परिणामों में भारी उलटफेर दिख सकता है। पिछली बार आरा की तरह ही रोहतास जिले में भी सात सीटों पर महागठबंधन का पलड़ा भारी रहा था। एनडीए को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी। इस बार महागठबंधन के दो विधायक जदयू के टिकट पर मैदान में हैं।

जमुई जिले में जमुई, झाझा, सिकंदरा और चकाई विधानसभा क्षेत्र हैं। पिछली बार इनमें से तीन पर महागठबंधन के प्रत्याशी विजयी रहे थे। पिछली बार चकाई को छोड़कर बाकी तीनों पर सीधा मुकाबला था। इस बार बदले समीकरणों और प्रभावशाली निर्दलीयों के कारण मुकाबला दिलचस्प देखा गया। रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे यहां खूब उठाए गए। बगल में शेखपुरा जिले में दो सीटें हैं। शेखपुरा से लगातार दो चुनाव जीत चुके रणधीर कुमार सोनी फिर से जदयू प्रत्याशी हैं। उधर, बरबीघा में कांग्रेस के निवर्तमान विधायक सुदर्शन कुमार जदयू प्रत्याशी हैं। इससे मुकाबले का अंदाजा सहज ही हो जाता है। बता दें कि लोजपा नेता चिराग पासवान जमुई संसदीय सीट से ही लोकसभा पहुंचे हैं। बावजूद इसके, जमुई की किसी भी सीट पर उनकी पार्टी बहुत बढ़त लेती नहीं दिखी।

मुंगेर में तीन विधानसभा क्षेत्रों में से जमालपुर और तारापुर अभी जदयू के पास है। जबकि पिछले चुनाव में मुंगेर की सीट राजद को मिली थी। इस बार कई प्रभावशाली बागियों के मैदान में उतरने से हर सीट पर मुकाबला चौतरफा रहा। बागियों की वजह से लखीसराय की दोनों सीटों यानी सूर्यगढ़ा और लखीसराय में भी मुकाबला बहुकोणीय ही रहा। उधर, भागलपुर की कुल सात में से दो सीटों पर पहले चरण में मतदान हुआ। ये दो विधानसभा क्षेत्र हैं-कहलगांव और सुल्तानगंज। पिछली बार भागलपुर में नतीजा महागठबंधन के पक्ष में एकतरफा रहा था। लेकिन इस बार जदयू के साथ छोड़ देने से महागठबंधन की राह कठिन हो गई है। बांका जिले में पांच विधानसभा क्षेत्रों में दो-दो अभी राजद और जदयू के पास है। एक सीट भाजपा को मिली थी। इस बार सभी पांच सीटों पर एनडीए और महागठबंधन में सीधा मुकाबला देखा गया। लेकिन बक्सर की चार सीटों पर मुकाबला चौतरफा रहा। यूपी सीमा पास होने से लोजपा के अलावा रालोसपा-बसपा वाला गठबंधन भी टक्कर में बराबर दिखा। कुछ सीटों पर निर्दलीय भी काफी मजबूत दिखे। ऐसे में जीत की राह काफी कठिन दिख रही है। जहां तक कैमूर की बात है तो जिले में चार विधानसभा क्षेत्र हैं। भभुआ, चैनपुर, मोहनिया और रामगढ़। पिछली बार ये चारों सीटें भाजपा ने जीती थीं। इस बार जदयू का भी साथ मिल जाने से एनडीए की राह काफी आसान दिख रही है।

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