पहले चरण में आशा से कम मतदान से सवाल उठ रहे अधिक

अंशुमान, दरभंगा। क्या बिहार इस बार चुनावी परिभाषाओं की चली आ रही परंपराओं को तोड़ेगा? अब तक तमाम चुनावी पंडितों की राय यही रही है कि बदलाव के लिए अधिक मतदान जरूरी होता है। कम मतदान पर बदलाव शायद ही कहीं दिखा है। हां, ऐसे अनेक उदाहरण अवश्य हैं कि जब अधिक मतदान पर भी यथास्थिति बहाल रह गई। यह और इस तरह के सवाल पहले चरण में हुए मतदान के कारण उठ रहे हैं। दरअसल पहले चरण के प्रचार के समय विपक्षी महागठबंधन की सभाओं में लोगों की बड़े पैमाने पर जो भागीदारी देखी जा रही थी, उस अनुपात में मतदान नहीं हुआ। हालांकि 2015 के 54.75 प्रतिशत के मुकाबले इस बार पहले चरण की 71 सीटों पर कुछ अधिक यानी 55.69 प्रतिशत मतदान हुआ। लेकिन क्या लगभग एक प्रतिशत अधिक हुए इस मतदान को बदलाव के लिए पर्याप्त भारी मतदान माना जा सकता है? कहीं यह वोटों के बिखराव को तो नहीं दिखाता? अगर ऐसा है तो क्या इस बार त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं? इन सवालों के जवाब तो दस नवंबर को परिणाम आने पर ही मिलेगा, लेकिन इससे पहले आंकड़ों का विश्लेषण तो किया ही जाना चाहिए।

28 अक्तूबर को हुए मतदान के आंकड़े बताते हैं कि 71 में से सिर्फ 29 सीटों पर ही पिछली बार के मुकाबले वोट अधिक पड़े। बता दें कि 2015 में इनमें से 68 सीटों पर मतदान बढ़ा था। मतदान घटने-बढ़ने का असर भाजपा पर जरूर पड़ता है। इसका भी असर पड़ता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू किसके साथ है। पिछली बार जदयू भाजपा के खिलाफ राजद के साथ थी। इस बार साथ है। ऐसे में भाजपा को क्या सचमुच नुकसान हो सकता है, जबकि मतदान भी अधिक नहीं हुआ और जदयू भी साथ है। चुनावी पंडितों को ऐसा नहीं लगता। वैसे हकीकत यह भी है कि नीतीश जिसके साथ रहते हैं, उसे लाभ ही होता है। 2015 में राजद और उससे पहले 2010 में भाजपा को यह अनुभव हो चुका है।

2010 के चुनाव में नीतीश कुमार की जदयू और भाजपा साथ-साथ थी, तो एनडीए ने 206 सीटें जीती थीं। पहले चरण की 71 सीटों में से तब 39 जदयू ने और 22 भाजपा ने जीती थीं। यानी कुल 61 सीटें। 2015 दोनों अलग-अलग लड़े तो भाजपा इन 71 में से सिर्फ 13 सीटें ही जीत सकी। 2015 में इन सभी 71 सीटों पर 2010 के मुकाबले मतदान भी अधिक हुआ था। इसलिए बदलाव दिखा और 2010 में भाजपा ने जो 22 सीटें जीती थीं, उनमें से सिर्फ पांच ही बचा पाई। 2015 में हुए भारी मतदान से भाजपा से जो 17 सीटें छिन गईं, उनमें से सबसे ज्यादा 12 राजद को मिली थीं। कांग्रेस ने चार और जदयू ने एक सीट भाजपा से छीनी थी।

इस बार पहले चरण में जिन 71 सीटों पर मतदान हुआ, उनमें 39 ऐसी थीं जहां तीन लाख से अधिक मतदाता थे। इन 39 सीटों में से 28 पर पिछली बार से कम मतदान हुआ। इसके उलट जहां तीन लाख से कम मतदाता थे, उनमें से एक-दो को छोड़कर बाकी पर पिछली बार से अधिक मतदान हुआ। साढ़े तीन लाख से अधिक मतदाताओं वाले जिन बड़े क्षेत्रों ने बड़ा दिल नहीं दिखाया, उनमें हिसुआ, लखीसराय, नवादा, वारिसलीगंज और सासाराम भी शामिल हैं।

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