56 वर्ष पुराने एजेंडे पर लौटी विहिप

शरद, दरभंगा। विश्व हिंदू परिषद ने एक बार फिर संस्कार, सेवा, संगठन और समरसता के 56 वर्ष पुराने एजेंडे पर लौटने का फैसला किया है। अब मंदिर और गोरक्षा जैसे विषय उसके एजेंडे में नहीं रहेंगे।
यह निर्णय विहिप की भोपाल में आयोजित 72-सदस्यीय केंद्रीय समिति की बैठक में लिया गया। इस बैठक में पहली बार सरसंघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी दोनों ही मौजूद थे। सामान्यता अनुषांगिक संगठनों की बैठक में इन दोनों में से एक ही व्यक्ति भाग लेता है।
भोपाल में पिछले सप्ताह आयोजित इस बैठक में माना गया कि 1984 से 1992 तक चला राम मंदिर आंदोलन विहिप के मूल उद्देश्यों के अनुरूप नहीं था। वह एक जन-आंदोलन था। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने अमर उजाला से कहा – यह आंदोलन हमारे नियंत्रण में नहीं था। ऐसा आंदोलन बहुत शक्ति ले लेता है। उस दौरान अन्य सब कुछ गौड़ हो जाता है।
तो क्या वह विहिप की दिशा परिवर्तन का निर्णय हो गया है? आलोक कुमार कहते हैं – चूंकि राम मंदिर का काम पूरा हो चुका है, हमारा संगठन अपने मूल उद्देश्य – देश-विदेश में हिंदुओं को संगठित करने, समरसता की स्थापना और अनुसूचित जाति जनजातियों के लिए काम करने – की ओर लौट रहा है। इन्हीं कार्यों के लिए 1964 में विहिप की स्थापना हुई थी।
लेकिन 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित विश्व की पहली धर्म संसद में राम मंदिर के अलावा क्या कृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनरुद्धार का भी संकल्प नहीं लिया गया था? आलोक कुमार कहते हैं – अवश्य लिया गया था। लेकिन अब हम राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण होने तक कोई अन्य काम हाथ में नहीं लेंगे। इस काम में तीन वर्ष लगेंगे।
तो फिर 3 वर्षों के बाद क्या मथुरा और काशी विहिप के एजेंडे पर वापस लौटेंगे? आलोक कुमार कहते हैं, इस पर उसी समय विचार होगा। अभी कैसे कुछ कहा जा सकता है।

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