बिहार में भाजपा से डरी कांग्रेस बंगाल में करेगी वामदलों से गठबंधन

सारांश, कोलकाता। बिहार विधानसभा चुनाव में लड़ी 70 सीटों में से महज 19 जीतने वाली कांग्रेस चौतरफा घिर गई है। बल्कि उसके वजूद तक पर सवाल उठने लगे हैं। यही कारण है कि वह पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ औपचारिक गठबंधन करने पर मजबूर हो गई है। इस बार वामदल और कांग्रेस यानी दोनों के नेता बाकायदा मंच साझा करेंगे, साझा चुनाव प्रचार चलाएंगे और हो सका तो न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी जारी करेंगे। इस बारे में हाल ही में हुई सीपीएम की केंद्रीय समिति की बैठक में फैसला ले लिया गया है। हालांकि अंतिम समझौते का प्रारूप बनाने की जिम्मेदारी प्रदेश समिति पर छोड़ दी गई है।

पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2016 में भी दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर समझौता तो हुआ था। लेकिन उनके बीच जमीनी स्तर पर कोई भी तालमेल नहीं था। दोनों के अलग एजेंडे थे। दोनों के नेताओं ने अलग-अलग प्रचार किया था। सिर्फ अंतिम चुनावी सभा में राहुल गांधी के साथ मंच पर पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव दासगुप्ता दिखाई दिए थे। तब कांग्रेस ने 92 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें से वह 12.25 प्रतिशत मत लेकर 44 सीटें जीतने में सफल हुई थी। जबकि सीपीआई और सीपीएम ने मिलाकर 159 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। 21.2 प्रतिशत मत पाकर उनके 27 विधायक जीते थे। आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक पांच सीटों पर विजयी हुई थी। वोट 4.5 प्रतिशत ही मिले थे। यानी गठबंधन को कुल मिलाकर 39 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने 45 प्रतिशत मत हासिल करने के साथ ही 293 में से 219 सीटें जीतकर धमाकेदार जीत दर्ज की थी। बता दें कि राज्य विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं। लेकिन इस बार तृणमूल कांग्रेस भी उस भाजपा के साथ कठिन लड़ाई में फंस गई है, जिसने 2016 के विधानसभा चुनाव में 291 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद 10 प्रतिशत वोट के साथ मात्र तीन सीटें ही जीत पाई थी।

तृणमूल कांग्रेस के डर की मुख्य वजह है पिछला लोकसभा चुनाव। उसमें भाजपा ने 40.64 प्रतिशत मत हासिल कर प्रदेश की 40 में से 18 सीटें हासिल कर ली थी। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को 43.69 प्रतिशत मत और केवल 22 सीटें मिल पाईं। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद तृणमूल 34 सीटें जीतकर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले डेढ़ वर्ष में भाजपा ने बंगाल में काफी मेहनत की है। उसका सीधा मुकाबला तृणमूल कांग्रेस से होना है। यही वजह है कि इस बार वाम दल और कांग्रेस दोनों के ही सामने अस्तित्व का संकट है। पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस राज्य की 40 में से सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी, जबकि वामदलों के खाते में कुछ भी नहीं आया था। उन्हें आशंका है कि यही स्थिति कहीं विधानसभा चुनावों में भी ना दोहरा जाए।

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