हाय री कांग्रेस, चुनाव लड़ाया बाहरी नेताओं ने और गाज बिहारी पर

पलक, नई दिल्ली। बिहार में पहले लोकसभा चुनाव और अब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार का साइड इफेक्ट दिखने लगा है। पिछले साल बिहार में लोकसभा की 40 में से सिर्फ एक सीट जीतने के बावजूद चुनाव प्रभारी बनाए रखे गए गुजराती नेता शक्ति सिंह गोहिल की विदाई तय हो गई है। वह अपने साथ बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा की कुर्सी भी ले जाएंगे। साथ ही बदले जाएंगे सभी पदाधिकारी। सूत्रों के मुताबिक, गोहिल ने राष्ट्रीय अध्यक्ष को इस्तीफा भेज दिया है। इसे देख प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा ने भी पद छोड़ने की पेशकश कर दी है। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें दिल्ली तलब किया है। सूत्रों के मुताबिक प्रेमचंद्र मिश्र को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है। वह पहले भी प्रदेश कांग्रेस में सचिव, महासचिव और उपाध्यक्ष रह चुके हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के साथ मिलकर 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली कांग्रेस के घटिया प्रदर्शन के बाद बलि का बकरा तलाशा जा रहा है। बता दें कि कांग्रेस के 70 में से कुल 19 उम्मीदवार ही विधानसभा पहुंच पाए। कांग्रेस के इस तरह पिछड़ जाने से महागठबंधन नेता तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री बनने का सपना अधूरा रह गया। इस कारण जहां महागठबंधन में शामिल राजद और वामपंथी पार्टियों ने उस पर हल्ला बोल दिया, वहीं कांग्रेस के अंदर भी जवाबदेही तय करने की मांग शुरू हो गई। हालांकि दो दिन दिन पहले जब राजद नेता शिवानंद तिवारी ने राहुल गांधी और प्रियंका पर बड़े सवाल खड़े किए थे तब शक्ति सिंह गोहिल ने जोरदार पलटवार किया था। लेकिन इस जुबानी जंग से सदन में सीटें नहीं बढ़ती हैं। लिहाजा गुजरात से आकर चुनाव प्रभारी बने शक्ति सिंह गोहिल ने इस्तीफे की पेशकश कर दी। अब इस्तीफे शायद स्वीकार भी कर लिए जाएंगे, और पदाधिकारियों के स्तर जातिगत समीकरणों को देखते हुए काफी सारे फेरबदल भी देखने को मिल सकते हैं।

बावजूद इसके, कांग्रेस को हार की असली वजहों की पड़ताल करनी ही होगी। उसे समझना ही होगा कि जब तक स्थानीय स्तर पर पार्टी की नींव मजबूत नहीं होगी, तब तक छत पर बाहरी नेताओं को बैठाकर साज-सज्जा कर देने से इमारत नहीं बचेगी। इस हार की जवाबदेही से पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी नहीं बच सकता है। आलाकमान के निर्देश पर ही ऐसा शायद पहली बार हुआ जब पार्टी की केंद्रीय इकाई ने किसी राज्य का चुनाव प्रबंधन और तैयारियों का पूरा जिम्मा ले लिया। राज्य के नेता जहां पीछे धकेल दिए गए, वहीं प्रत्याशियों के चयन में जमीनी हकीकत और कार्यकर्ताओं की भारी अनदेखी की गई। जब प्रत्याशियों के चयन में गड़बड़ी का मामला सामने आया तो आलाकमान ने चुनाव चयन समिति से प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा, सदानंद सिंह और कांग्रेस सांसद अखिलेश सिंह को ही निकाल दिया। हद तो तब हो गई, जब घोषणापत्र जारी करते समय भी फ्रंट पर रहने वाले तीन नेताओं में थे- हरियाणा से आए रणदीप सिंह सुरजेवाला, उत्तर प्रदेश से आए राजबब्बर और गुजरात के कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल। विधानसभा चुनाव लड़ रही पार्टी को स्थानीय नेता इस लायक नहीं लगे। हैरानी की बात यह कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा भी ऐसे मौके पर नहीं दिखे। टिकट वितरण में भी भाई-भतीजावाद खूब चला।

बिहार में कांग्रेस कितनी कमजोर जमीन पर खड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा दो बार से विधानसभा चुनाव लड़ने का साहस नहीं दिखा पा रहे। वह दरभंगा शिक्षक क्षेत्र से विधानपरिषद का चुनाव लड़ते हैं और दो बार से विजयी भी रहते हैं। मदन मोहन झा को प्रदेश अध्यक्ष सवर्ण मतदाताओं को लुभाने के मकसद से बनाया गया था। बदले में पार्टी मिथिलांचल की उन क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई, जहां ब्राह्मण अधिक थे। मधुबनी में बेनीपट्टी सीट पर पिछली बार विधायक चुनी गईं कांग्रेस की भावना झा अबकी हार गईं। दरभंगा के कुशेश्वरस्थान में शुरू से ही बढ़त बनाए हुए कांग्रेस प्रत्याशी अशोक कुमार अंत में हार गए। पार्टी ने उस वोट बैंक पर भरोसा किया, जो उसके बजाय राजद का है। जैसे-मुस्लिम। मुस्लिम मतदाता अब सीमांचल और सीवान क्षेत्र को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस के साथ नहीं रह गए हैं। वे या तो राजद के साथ हैं या ओवैसी की पार्टी के साथ। यह जानते हुए भी कांग्रेस ने दरभंगा के जाले में उस मशकूर अहमद उस्मानी को टिकट दे दिया, जो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना के पोस्टर को लेकर विवादित हुए थे। यह सब तब किया गया जब प्रदेश कांग्रेस के पास आज की तारीख में कोई बड़ा मुस्लिम नेता तक नहीं है। इस तरह के अनगिनत कारण हैं, जिन पर चर्चा किए बगैर बिहार में कांग्रेस का कतई भला नहीं होने वाला। पदाधिकारियों के पत्ते फेंटने से जमीन पर कार्यकर्ता नहीं बनेंगे।

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