अर्णब पर अलर्ट केंद्र सरकार से अन्य पत्रकारों को जगी उम्मीद

नई दिल्ली। रिपब्लिक टीवी के सर्वेसर्वा और वरिष्ठ पत्रकार अर्णब गोस्वामी को मुंबई पुलिस द्वारा एक दो वर्ष पुराने मामले में बुधवार को गिरफ्तार किए जाने से पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला एक बार फिर फोकस में आ गया है। पिछले सात सालों के दौरान पत्रकारों के खिलाफ सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र या जम्मू और कश्मीर में नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए हैं। ऐसे मामलों में राज्य तो छोड़िए, केंद्र सरकार ने भी कभी संज्ञान नहीं लिया। हालांकि अर्णब गोस्वामी मामले में फौरन जागी केंद्र सरकार और नेताओं की प्रतिक्रियाओं से यह उम्मीद हुई है कि छोटे पत्रकारों के मामले अब कतई नहीं दबेंगे। बता दें कि अर्णब को एक इंटीरियर डिजाइनर की आत्महत्या से जुड़े दो साल पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है। यह मामला पहले बंद हो गया था, लेकिन पिछले दिनों इसमें दोबारा जांच के आदेश दिए गए हैं। इस गिरफ्तारी पर देश के गृह मंत्री से लेकर तमाम बड़े नेता अर्णब के पक्ष में खड़े हो गए हैं। सबने महाराष्ट्र सरकार में शामिल कांग्रेस पर भी बड़े हमले किए।। वहीं, महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि राज्य में सब कानून के हिसाब से चल रहा है। अमित शाह ने कहा है कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने लोकतंत्र को फिर शर्मसार कर दिया है। राज्य की सत्ता का दुरुपयोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है। यह हमें आपातकाल की याद दिलाता है।

इससे पहले भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने इस मुद्दे पर प्रेस कांफ्रेंस की। कहा, ‘सिर्फ किसी एक चैनल के नहीं, बल्कि सभी चैनलों के अधिकार के लिए आज हम आवाज उठा रहे हैं। मां-बेटे की माफिया सरकार ने सिर्फ प्रेस के ऊपर ही आघात नहीं किया, बल्कि जब इनके पक्ष में फैसला नहीं आता तो ये मुख्य न्यायाधीश को भी नहीं छोड़ते।’ उन्होंने इस सिलसिले में बिना नाम लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर हमला बोला। कहा कि एक तरफ सोनिया गांधी लेख लिखती हैं और कहती हैं कि लोकतंत्र की हत्या हो रही है और राहुल गांधी लिखते और कहते हैं- वह प्रेम की राजनीति करते हैं। क्या इस मामले में लोकतंत्र की हत्या नहीं की जा रही है? क्या यह प्रेम की राजनीति है? पात्रा ने कहा कंधा तो शिवसेना का है, मगर बंदूक, बारूद और सारा कुछ उन मां-बेटे का है जो हिंदुस्तान में लोकतंत्र को समाप्त करने के लिए लड़ रहे हैं। असम के मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा बोले- मैंने सुना था कि मुंबई पुलिस कमिश्नर एक मजबूत अधिकारी थे लेकिन अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार करने के लिए उन्हें एके -47 के साथ पुलिस भेजनी पड़ी, इसका मतलब है कि वह पूरे भारत में सबसे कायर अधिकारी हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अपने दिवंगत पिता, महाराष्ट्र और देश को बदनाम किया है। महाराष्ट्र सरकार को अर्णब गोस्वामी को तुरंत रिहा करना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।

इसके साथ ही सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से लेकर कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी और कानून मंत्री रविशंकर तक ने अर्णब की गिरफ्तारी का विरोध किया। इसे काला दिन तक करार दिया। इस क्रम में सबने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की लोकसभा में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2013 के बाद पूरे देश में पत्रकारों के खिलाफ दर्ज 190 मामलों में से उत्तर प्रदेश में 67 मामले दर्ज किए गए हैं। मध्यप्रदेश में 50 और बिहार में 20 पत्रकारों पर हमले हुए हैं। मिर्जापुर में मिड डे मील के नाम पर बच्चों को सूखी रोटी और नमक देने की रिपोर्ट बनाने वाले पर पत्रकार पवन कुमार जायसवाल के खिलाफ मामला हो या हाथरस में केरल के एक पत्रकार कप्पन के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा, उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। जून में रेत माफिया के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार शुभम त्रिपाठी की गोली मार कर हत्या करने का मामला हो या फिर दो महीने पहले बलिया के पत्रकार रतन सिंह की हत्या। पूरे देश में पत्रकार सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में ही असुरक्षित हैं। एक मानवाधिकार संगठन राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप की एक रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान पत्रकारों के खिलाफ हमले के 55 मामले दर्ज किए गए। हिंदी भी 11 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा। जम्मू और कश्मीर में 6, हिमाचल में 5 और तमिलनाडु, बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र में चार-चार मामले दर्ज किए गए।

बहरहाल, अर्णब गोस्वामी को लेकर जिस तरह चौतरफा प्रतिक्रिया हुई है, वह स्वागत योग्य है। एडिटर्स गिल्ड तक ने कहा है कि सवाल करने और सूचना जुटाने के तौर-तरीके से असहमति के बावजूद पत्रकार की गिरफ्तारी निंदनीय है। गौरतलब है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में अर्णब के रिपब्लिक टीवी ने महाराष्ट्र सरकार खासकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है। इस अतिवादी पत्रकारिता के लिए हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चिंता जता चुका है। बावजूद इसके, दोनों तरफ से अतिवादी कदम उठाए ही जा रहे हैं।

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