पाक को चीन ने दिया जोर का झटका धीरे से

नई दिल्ली। दोस्ती की आड़ में चीन ने पाकिस्तान को जोर का झटका धीरे से दे दिया है। भारत विरोध में अंधे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान इसे समझने में जहां भूल कर बैठे, वहीं विपक्ष सतर्क होकर चीन का विरोध कर रहा है। दरअसल, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के लिए इमरान सरकार ने दक्षिण कराची स्थित दो द्वीपों को चीन को देने फैसला किया है। सामरिक दृष्टि से ये द्वीप महत्वपूर्ण हैं। ये सिंध प्रांत के लंबे समुद्र तट पर फैले हुए हैं। राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने इसके लिए बाकायदा पाकिस्तान आइलैंड विकास प्राधिकरण के माध्यम से दिए गए विधेयक पर दस्तखत भी कर दिए हैं। इससे सिंध और बलूचिस्तान में राजनीतिक भूचाल आ गया है। सिंध प्रांत में सत्तासीन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने इसे अवैध रूप से कब्जा करना बताया है। जियो सिंधी थिंकर्स फोरम ने भी कहा, हम अपनी जमीन को बेचने नहीं देंगे।

इस तरह आर्थिक गलियारे के नाम पर विकास का सपना दिखाने वाले चीन की बदनीयती अब पाकिस्तान को समझ आने लगी है। लिहाजा चीन-पाकिस्तान र्आर्थिक गलियारे को पाक सरकार और सेना के समर्थन के बावजूद गुलाम कश्मीर और बलूचिस्तान की जनता में व्यापक विरोध है। उनका मानना है कि ये सीधेतौर पर चीन का कब्जा है, लेकिन पाक सरकार इस मसले पर हो रहे विरोध को सख्ती से कुचलना चाहती है। मई माह में ऐसे ही कुछ संगठनों पर पाबंदी लगा दी गई थी। बलूचिस्तान की नेशनल पार्टी ने इसके खिलाफ देश भर में आंदोलन चलाने का एलान किया है। विरोधी नेताओं का आरोप है कि कब्जा कराने के लिये लाया गया यह विधेयक चीन की आर्थिक महत्वाकांक्षा को ही पूरा करेगा। इससे पाकिस्तान का कोई भला नहीं होने वाला। यहां पर चीन की गतिविधियां पर्यावरण का संकट भी उत्पन्न करेंगीं। इस क्षेत्र में चीन के बड़े इरादे हैं और यह विधेयक उसकी योजना का एक हिस्सा भर है। पाकिस्तान के ही कुछ विशेषज्ञों ने सवाल खड़ा किया है कि इन दोनों ही द्वीपों पर विकास की कोई गुंजाइश नहीं है तो चीन इनको आर्थिक विकास के नाम पर क्यों लेना चाहता है।

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