पानी के नाम पर 70 करोड़ बह गया, मुद्दा 7 पैसे का नहीं

विमलनाथ झा, दरभंगा। प्रमंडलीय मुख्यालय दरभंगा में शहरी जलापूर्ति योजना पर 15 वर्षों में करीब 70 करोड़ से अधिक रुपये खर्च हो चुके हैं। लेकिन अब तक 20 प्रतिशत शहरवासियों को भी नल-जल की सुविधा नहीं मिली है। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्राथमिकता सूची में नल-जल सबसे ऊपर है। विडंबना देखिए कि दरभंगा विधानसभा क्षेत्र में यह किसी भी दल के लिए जरूरी मुद्दा नहीं है।

जानकारी के अनुसार, 2006 में तत्कालीन नगर विकास मंत्री ने काफी ताम-झाम के साथ इस योजना का शिलान्यास किया था। तब उन्होंने कहा था कि आठ करोड़ की लागत से बीस वर्षों में सभी शहरवासियों के घर-घर में पानी पहुंचा दिया जाएगा। इस योजना को लागू कराने की जिम्मेदारी पीएचईडी को दी गई। विगत 15 वर्षों में इस योजना के तहत शहर में आठ पानी टंकी तैयार कराई गई। लेकिन जलापूर्ति के लिए भूमिगत पाइप बिछाने की जिम्मेदारी पीएचईडी एवं वुडको को है। पाइप बिछाने के लिए जहां पीएचईडी को 2986.255 लाख रुपये का भुगतान हो चुका है, वहीं वुडको को 3906.58 दिया जा चुका है। इस तरह पीएचईडी को दरभंगा शहर में 20391 तो वुडको को 34874 परिवारों को कनेक्शन देना है। हकीकत यह है कि पीएचईडी ने अब तक मात्र 1300 और वुडको ने 3500 घरों में कागज पर कनेक्शन दिया है। कनेक्शन की जमीनी सच्चाई यह है कि कनेक्शन वाले इन घरों में पानी का एक बूंद नहीं आ रहा।

अब तक शहर के 20 से अधिक वार्डों में अब तक पाइप भी नहीं बिछ पाई है। इसमें दरभंगा नगर निगम की मेयर के क्षेत्र भी शामिल हैं। प्रत्येक वर्ष जब गर्मी की तपिश बढ़ने से हैंडपंप सूख जाते हैं, तब निगम के पार्षदों और अफसरों की सक्रियता दिखती है। फिर जैसे ही बरसात शुरू होती है, सभी इसे भूल जाते हैं। जनता भी गर्मियों में रो-रोकर इन्हें कोसती जरूर रहती है, लेकिन जब चुनाव आता है तो इसे मुद्दा बनाने में दिलचस्पी नहीं लेती। लिहाजा, यह हर साल का आयोजन हो गया है।

विगत पांच वर्षों से पीएचईडी मंत्री बिनोद नारायण झा एवं जल संसाधन मंत्री संजय झा इसी प्रमंडल के हैं। इसके बावजूद योजनाओं की लेटलतीफी के प्रति कार्य एजेंसी पीएचईडी एवं एजेंट किर्लोस्कर एंड ब्रदर्स को कोई चिंता नहीं है। नगर निगम जब बिना जलापूर्ति के ही शहर के 55263 परिवारों से जल कर की वसूली कर रहा है, तो भला उसे क्यों चिंता होने लगी। जहां तक शहरवासियों की बात है तो सब इसे नियति मानकर खामोश हैं।

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