दरभंगा में जलजमाव, जलनिकासी और जलापूर्ति इस बार भी नहीं बना मुद्दा

विमलनाथ झा, दरभंगा। प्रमंडलीय मुख्यालय होते हुए भी दरभंगा शहर में जलापूर्ति, जलनिकासी और जलजमाव जैसी लाइलाज समस्याएं इस बार भी चुनावी मुद्दा नहीं बन सकीं। शहर के 48 वार्डों में से आधे से अधिक वार्डों में अब तक जलापूर्ति की व्यवस्था नहीं हो सकी है। तब जबकि शहरी जलापूर्ति मद में राज्य सरकार अब तक 48 करोड़ से अधिक राशि खर्च कर चुकी है।

हर वर्ष मार्च से जून तक जब भूजल स्तर नीचे जाने से हैंडपंप सूख जाते हैं, तब जिला प्रशासन से लेकर नगर निगम तक सख्ती बरतने का दिखावा करता है। बरसात शुरू होते ही फिर नौ महीने के लिए जलापूर्ति योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। सालाना उत्सव की तरह ऐसा हर वर्ष होता है। 48 वार्डों में से एक भी ऐसा सौभाग्यशाली नहीं है, जहां बरसात में जलजमाव नहीं होता हो। बता दें कि यहां नगर निगम 35 वर्षों से कार्यरत है। इसका वार्षिक बजट करीब एक अरब से अधिक का बनता है। शहरवासियों से कर के रूप में प्रतिवर्ष दस करोड़ से अधिक की वसूली होती है। इसके बावजूद जलनिकासी की समुचित व्यवस्था नहीं की जाती। करीब सात करोड़ से अधिक की लागत से तीन नालों के निर्माण के लिए ठेकेदार ही नहीं मिल रहे हैं। बताया जाता है कि तीन बार टेंडर के बावजूद कोई ठेकेदार नहीं मिला। इन नालों के निर्माण में अतिक्रमण सबसे बड़ी समस्या है। सड़क और पुराने बड़े नालों पर कब्जा कर मकान बना दिए गए हैं। और नहीं तो जहां-तहां दीवार ही खड़ी कर दी गई है। ऐसे में कब्जा खाली कराना प्रशासन के बड़ी चुनौती है।

ठीक ऐसी ही स्थिति शहर के तीनों बड़े आउटलेटों की है। कादिराबाद से कगबा गुमटी होते हुए कमला नदी, दरभंगा नगर निगम से सकमा पुल, दोनारा, रेल पुल संख्या-21 होते हुए गौसाघाट और लहेरियासराय गायत्री मंदिर से चट्टी चौक होते हुए कमला नदी तक के सभी आउटलेटों पर कब्जा हो चुका है। इसके कारण साल दर साल जलजमाव की समस्या विकराल होती जा रही है। इन समस्याओं से शहरवासी हर साल परेशान रहते हैं। दो दशक से शहर का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधि भी इससे रूबरू होते हैं। फिर भी इन समस्याओं का चुनावी मुद्दा नहीं बन पाना हैरान करता है।

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