हे सरकार, दरभंगा एयरपोर्ट को रेलवे का हाल्ट नहीं लगना चाहिए

विमलनाथ झा, दरभंगा। लंबे इंतजार के बाद मिथिलावासियों का दरभंगा में एयरपोर्ट का सपना जरूर साकार हो गया है, लेकिन अभी भी बहुत काम करना बाकी है। एयरपोर्ट के अंदर कहीं कोई परेशानी नहीं है। बेशुमार समस्याएं तो बाहर हैं। ऐसी-ऐसी कि एयरपोर्ट से निकलते ही रेलवे के किसी हाल्ट पर पहुंचने की पीड़ा होने लगती है। बाहर से आने वाले विमान यात्रियों से लेकर उन्हें रिसीव करने पहुंचे परिजनों तक को। बाहर निकलते ही दरभंगा-जयनकर की व्यस्त सड़क सबसे पहले डराने लगती है। एयरपोर्ट के गेट से निकलते ही यात्री सड़क पर होते हैं। वहां पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं होने से सड़क पर तमाम छोटे-बड़े वाहनों से बचते हुए चलना होता है। माफ कीजिए, जिसे हमने सड़क समझा वह तो एनएच है। मात्र 12 फीट की चौड़ाई वाला एनएच नंबर-105। एनएच का नाम देख डबल लेन का भ्रम कतई नहीं पालें। दरभंगा के दिल्ली मोड़ से केवटी के छतवन तक सिंगल लेन वाला ही एनएच है। वह भी इसलिए बन गया, क्योंकि 2018 में हुकुमदेव नारायण यादव ने लोकसभा में सवाल उठा दिया था। इससे आठ से लंबित इस एनएच को बना तो दिया गया, लेकिन चौड़ीकरण का काम नहीं हुआ।

दरभंगा से विमान सेवा के अलावा कैब सर्विस भी शुरू हो गई। नाम है उगना कैब। उसकी टैक्सियां एयरपोर्ट के सामने ही सड़क से नीचे इस तरह खड़ी रहती हैं

इस तरह बाहर पार्किंग के नाम पर सिंगल लेन वाला यही एनएच है। इससे खुद बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। वैसे कुछ खर्च करने पर सड़क पर दूसरी ओर वाले गैराज में पार्किंग की सुविधा मिल जाती है। बशर्ते वहां जगह हो। इसलिए कि शहर में ताजा-ताजा शुरू हुई उगना कैब सर्विस के तहत टैक्सियां भी वहीं खड़ी रहती हैं। दूसरे, वह सड़क से बहुत नीचे है। ऐसे में अगर जमकर बारिश हो जाए तो अलग संकट। यह सब संकट विमान यात्रियों के लिए कम, उन्हें छोड़ने और ले जाने वाले दूर-दराज से आए परिजनों के लिए अधिक है। यात्री तो एयरपोर्ट से निकल कर अपने या किराए वाले वाहन में बैठ गंतव्य की ओर निकल लेते हैं। लेकिन दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु से आने वाले परिजनों को रिसीव करने वाले और इन शहरों के लिए एयरपोर्ट पहुंचाने वालों की दुर्गत बन जाती है। जैसे मुंबई के लिए फ्लाइट अगर तीन बजे है, तो यात्रियों को तीन घंटे पहले बुलाया जाता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। गलत तब लगता है, जब उस यात्री को अंदर जाने से रोक दिया जाता है। टर्मिनल भवन अभी एक बार में सौ से अधिक यात्रियों को नहीं संभाल सकता। इसलिए इससे पहले बेंगलुरु से आने वाली फ्लाइट और दिल्ली जाने वाली फ्लाइट के मद्देनजर तीसरी फ्लाइट के यात्रियों को काफी देर तक बाहर रोकना मजबूरी बन जाती है।

एयरपोर्ट के बाहर इंतजार करने वालों के लिए बैजू की यह चाय दुकान ही है एकमात्र सहारा

बाहर जहां पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है, वहीं किसी के लिए खड़े होने का भी इंतजाम नहीं है। ऐसा सामान्य दिनों में है। इससे बारिश और कड़ाके की सर्दी वाले दिनों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। अब सर्दी शुरू हो गई है। ऐसे में अगर चाय की तलब लगे, तो एयरपोर्ट के गेट नंबर-2 के सामने दूसरे तरफ सड़क से नीचे और नाला किराने बनी झोपड़ी वाली दुकान का ही सहारा रहता है। इस दुकान को चलाने वाले बैजू एयरपोर्ट चालू होने से बढ़ गई आमदनी से खुश हैं, लेकिन जल्द ही आसपास होने वाली चकाचौंध में हाशिये पर रह जाने का अनुमान कर चिंतित भी हैं। फिर भी कहते हैं- तब की बात तब, अभी तो सब बढ़िया है।

जाहिर है, एयरपोर्ट के अंदर जब तैयारी चल रही थी तब उसके साथ ही बाहर की चिंता नहीं की गई। इसीलिए दरभंगा के पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद कहते हैं- भारत सरकार ने यहां विकसित एयरपोर्ट का आधार जुटाने में कंजूसी की है। उन्होंने इस सिलसिले में राज्य सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़े किए। कहा- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो दरभंगा के बजाय पूर्णिया से हवाई सेवा शुरू कराने में दिलचस्पी दिखा रहे थे। इससे जहां इस परियोजना में देरी हुई, वहीं स्थानीय प्रशासन ने एयरपोर्ट के आसपास बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की परवाह ही नहीं की।

ऐसा नहीं है कि यहां हालात नहीं बदलेंगे। बदलने की पूरी योजना है। शिकायत इस बात की है कि यह सब एयरपोर्ट के साथ-साथ हो जाना चाहिए था। जैसे, ठीक बगल वाले दिल्ली मोड बस स्टैंड को एयरपोर्ट की पार्किंग बनानी है। बस स्टैंड को यहां से मब्बी ले जाना है। वहां इसके लिए 32 भारत सरकार 32 एकड़ जमीन अधिग्रहीत भी कर चुकी है। अगर अब भी वहां बस स्टैंड बनाने का काम शुरू हो जाए, तब भी पूरा होने में अगला लोकसभा चुनाव आ जाएगा। अभी तो स्थिति यह है कि सोमवार के कारण शहरवासी दिनभर जाम से जूझते रहे। चूंकि विमान सेवा शुरू होने वाले दिन यानी आठ नवंबर को रविवार था, इसलिए पहले दिन यह मुद्दा नहीं उठा। वरना जिस दिन कोई छुट्टी नहीं होगी, शहर के साथ-साथ एयरपोर्ट के आसपास भी भारी जाम से दो-चार होना ही पड़ेगा।

बहरहाल, किसी भी चीज की शुरुआत अनगढ़ ही होती है। अफसोस कि दरभंगा एयरपोर्ट भी इसका अपवाद नहीं बन सका। इसलिए विमान के लिए

पटना आने-जाने के झंझट के मद्देनजर फिलहाल इतना झेला जा सकता है। इस उम्मीद के साथ भी कि राज्य सरकार पार्किंग की लंबित परियोजना पर जल्द कार्य आरंभ कर देगी। तब तक एनएच-105 को जल्द से डबल लेन कर देना चाहिए। ताकि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु से आने वालों को दरभंगा एयरपोर्ट भी भले छोटा ही सही लेकिन एयरपोर्ट ही लगे। ना कि रेलवे का हाल्ट।

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