दरभंगा में एनडीए को 10 में से 9 सीटें, केवटी में राजद नेता सिद्दीकी हारे

केवटी में राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी को हराने वाले भाजपा प्रत्याशी मुरारी मोहन झा

विमलनाथ झा, दरभंगा। बिहार विधानसभा चुनाव में दरभंगा जिले की सभी दस सीटों के परिणाम आ चुके हैं। जिले में भाजपा-जदयू वाले गठबंधन एनडीए ने लगभग एकतरफा जीत हासिल की है। दरभंगा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा और दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के एकजुट रहने से दस में से नौ सीटों पर उसके प्रत्याशी विजयी रहे। राजद को सिर्फ दरभंगा ग्रामीण की एक सीट जीतकर संतोष करना पड़ा। सबसे बड़ा उलटफेर केवटी में हुआ। वहां भाजपा के मुरारी मोहन झा ने सभी अनुमानों को ध्वस्त करते हुए राजद के कद्दावर नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी को हरा दिया। सिद्दीकी पिछली बार अलीनगर से जीते थे, लेकिन इस बार उन्होंने सीट बदल ली थी। दरभंगा शहर से भाजपा के संजय सरावगी पांचवीं बार जीत गए हैं। उन्होंने राजद के अमरनाथ गामी को सीधे मुकाबले में हरा दिया। गामी पिछली बार जदयू के टिकट से विधायक चुने गए थे। इस बार राजद में शामिल होते हुए दरभंगा शहर से भाग्य आजमा रहे थे।
इसी तरह बहादुरपुर सीट भी एनडीए में जदयू के खाते में गई है। यहां से नीतीश सरकार में मंत्री मदन सहनी विजयी रहे हैं। उन्होंने राजद के आरके चौधरी को हराया। इसी तरह बेनीपुर में कांटे की टक्कर में जदयू के अजय कुमार चौधरी विजयी रहे हैं। अलीनगर में एनडीए में शामिल वीआईपी के मिश्रीलाल यादव, जाले में भाजपा के जीवेश कुमार, हायाघाट में भाजपा के रामचंद्र प्रसाद, कुशेश्वरस्थान से जदयू के शशिभूषण हजारी, गौड़ाबौराम से वीआईपी की स्वर्णा सिंह भी विजयी रहे हैं। लेकिन दरभंगा ग्रामीण सीट से राजद के ललित यादव फिर जीत गए हैं। उन्होंने जदयू के डॉ. फराज फातमी को हराया। बता दें कि मिथिलांचल के वरिष्ठ मुस्लिम नेता अली अशरफ फातमी के पुत्र फराज फातमी पिछली बार केवटी से विधायक चुने गए थे। तब वह राजद में थे। इस बार पिता की तरह जदयू में आने के बाद सीट बदलते हुए दरभंगा ग्रामीण से चुनाव लड रहे थे।

दल और क्षेत्र बदलुओं से राजद में था असंतोष-

वैसे परिणामों पर गौर करें तो इसकी भूमिका चुनाव शुरू होने से पहले ही बन चुकी थी। दलबदलुओं को मनचाहा सीट और निवर्तमान विधायकों को दूसरे क्षेत्र में उछल-कूद को देख राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के पुराने समर्पित कार्यकर्ता हतप्रभ थे। ऐसे में वे इस दल से जुड़े तो रहे, पर पहले जैसी प्रतिबद्धता उनके दिल में नहीं थी। दो दशक पूर्व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की एक आवाज पर एक पैर पर खड़े रहने वाले समर्पित कार्यकर्ता दलबदलुओं का सम्मान बढ़ते देख कतई खुश नहीं थे। जिले की दस में से सात सीटों पर राजद और तीन पर कांग्रेस चुनाव लड़ रही थी। इनमें इकलौते ललित यादव ही थे, जो लगातार दरभंगा ग्रामीण से भाग्य आजमा रहे थे। पार्टी के वरीय नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी अपने पुराने क्षेत्र अलीनगर को छोड़कर केवटी और भोला यादव बहादुरपुर के बजाय हायाघाट से चुनाव लड़ने चले गए थे। पार्टी नेतृत्व ने जिन दलबदलुओं या क्षेत्र बदलुओं को प्रत्याशी बनाया, वे सब हार गए। इनमें दरभंगा से अमरनाथ गामी, बहादुरपुर से आरके चौधरी, अलीनगर से विनोद मिश्र और गौड़ाबौराम से इजहार अहमद हैं। ये चारों भाजपा, जदयू और लोजपा से आए हुए थे।

कांग्रेस ने पहले ही दे दिया था वाकओवर-

महागठबंधन में बड़े भाई की भूमिका वाले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस चुनाव में कांग्रेस को आशातीत 70 सीटें दी थीं। दरभंगा जिले में इनमें से तीन सीटें थीं-जाले, कुशेश्वरस्थान और बेनीपुर। लेकिन प्रत्याशियों के चयन में शीर्ष नेतृत्व ने जिस अदूरदर्शिता का परिचय दिया, वह हैरान करने वाला था। कांग्रेस प्रत्याशियों को देखकर लगा था जैसे उसने चुनाव पूर्व ही सत्तारूढ़ एनडीए को वाकओवर दे दिया है। बता दें कि तीन माह पूर्व आलाकमान ने प्रत्याशियों के चयन में पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए सभी जिलों में एक-एक पर्यवेक्षक भेजा था। फिर जिला कमिटी, पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट की विवेचना कर राज्य की स्क्रीनिंग कमिटी ने जो सूची केंद्रीय आलाकमान को भेजी, उसे पूरी तरह दरकिनार कर पैराशूट उम्दीवारों को चुनाव मैदान में उतार दिया गया था। खासकर जिले के जाले विधानसभा क्षेत्र में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष मशकूर अहमद उस्मानी को जब प्रत्याशी बनाया गया तो जिन्ना विवाद ने तभी उनकी छवि नकारात्मक बना दी थी। इसी तरह बेनीपुर की सीट कांग्रेस जीत सकती थी, अगर वहां जदयू से पिछली बार विधायक रहे सुनील चौधरी को टिकट दिया गया होता। बतौर विधायक क्षेत्र में काफी करने से सुनील चौधरी सब पर भारी थे। जदयू से टिकट कटने पर उन्होंने कांग्रेस के बहुत हाथ जोड़े थे, लेकिन टिकट मिल गया अनजाने मिथिलेश चौधरी को। उनकी विशेषता यही थी कि वह पूर्व सांसद कीर्ति आजाद के करीबी थे। उधर, कुशेश्वरस्थान में कांग्रेस के डॉ. अशोक कुमार की टक्कर बिहार सरकार के मंत्री और जदयू नेता शशिभूषण हजारी से थी। शुरू में प्रचार के दौरान हजारी का जिस तरह कुछ जगहों पर विरोध हुआ, इससे कांग्रेस की उम्मीद बढ़ गई थी। फिर जदयू का खेल बिगाड़ने के लिए लोजपा ने जब पूनम कुमारी को मैदान में उतार दिया तो अशोक कुमार की जीत पक्की लगने लगी। लेकिन नीतीश कुमार के समर्थक खामोश मतदाताओं ने सारे गणित फेल कर दिए।

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