गठबंधन से पहले ही छूट रहा साथ

अभिषेक, दरभंगा। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब कुछ दिन शेष हैं। गुरुवार से 17 जिलों में पहले चरण की वोटिंग के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। 8 अक्टूबर तक चलने वाली इस प्रक्रिया के लिए अबतक बड़े राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्ष अबतक सीटों का बंटवारा भी नहीं कर सका है। एक ओर जहां एनडीए के घटक दल लगभग तय हैं, वहीं दूसरी ओर महागठबंधन की गांठें अबतक नहीं जुड़ी हैं। महागठबंधन का हर घटक अपनी महत्वाकांक्षा लेकर बैठा है। इसलिए अब तक कौन सी पार्टी कितने सीटों पर मैदान में उतरेगी ये भी तय नहीं हुआ है।

चुनाव से पहले सब एक, ऐन मौके पर जुदा होने लगी राह

बिहार में चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियां अपनी एकजुटता दिखाते नहीं थकती थी, लेकिन चुनाव के दिन नजदीक आते-आते इन पार्टियों की राहें दूर होने लगीं। महागठबंधन की सभी पार्टियां खुद मुख्यमंत्री का पद चाहने लगीं। इससे इनके बीच दूरियां बढ़ने लगीं। पहले राजद, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, माले आदि महागठबंधन के प्रमुख घटक दल थे। प्रदेश की प्रमुख विपक्ष पार्टी राष्ट्रीय जनता दल शुरू से इस स्टैंड पर रहा कि प्रदेश की सत्ता पर अगर महागठबंधन पहुंचता है तो उसके नेता तेजस्वी यादव ही मुख्यमंत्री बनेंगे। शुरू में तमाम दलों ने इसका विरोध नहीं किया, तो तेजस्वी ने इसे सबकी मौन सहमति मान ली। अपनी तैयारी उसी हिसाब से करने लगे। अब चुनाव की तिथियों की घोषणा होने के बाद घटक दल अपनी महत्वाकांक्षा में आकर तेजस्वी से कन्नी काटने लगे।

हाथी की सवारी करने निकल गए उपेंद्र

केंद्र में मोदीजी की पहली सरकार में मानव संसाधन राज्य मंत्री रहे उपेंद्र कुशवाहा ने सीटें कम मिलने के कारण 2019 में एनडीए से अलग होकर महागठबंधन में आए थे। हालांकि कुशवाहा का यह दांव सही साबित नहीं हो सका। उन्हें महागठबंधन से जुड़ने पर 6 सीटें मिलीं (एनडीए 4 सीटें दे रही थी), पर एक सीट पर कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह के बेटे ने रालोसपा के सिंबल से चुनाव लड़ा, तो दूसरी सीट से उपेंद्र खुद ही चुनाव लड़े। मगर उपेंद्र का ये दांव उलटा पड़ गया। चुनाव में उनका और उनकी पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। सबसे अधिक नुकसान उन्हें एनडीए से अलग होकर यह लगा कि उनकी मंत्री पद से छुट्टी हो गई। इसके बाद कुशवाहा करीब डेढ़ साल तक विपक्ष में रहे और अभी जब प्रदेश में चुनाव की डुगडुगी बचने से ऐन पहले वो फिर एनडीए में वापसी का सपना संजो रहे थे, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद थक कर उपेंद्र मायावती की बहुजन समाज पार्टी के हाथी पर सवार होकर प्रदेश में मुख्यमंत्री के एक नए चेहरा हो गए।

सीटों की अनिश्चितता को लेकर माले ने भी छोड़ा साथ

नामांकन से एक दिन पहले तक महागठबंधन के प्रमुख घटक दलों में सीटों का बंटवारा नहीं हो सका। इस कारण सीपीआई एमएल (माले) महागठबंधन से निकल कर पहले चरण के मतदान के लिए अपने सीटों की घोषणा भी कर दी। इधर खबर है कि कद्दावर राजद नेता भोला यादव पार्टी के उम्मीदवारों के नाम पर मुहर लगवाने अपने सुप्रीमो लालू प्रसाद के पास गए हैं। लालू अभी चारा घोटाले में सजायाफ्ता होकर रांची के होटवार जेल में बंद हैं। चर्चा है कि भोला यादव सभी 243 सीट के लिए लालू के पास हस्ताक्षर करवाने गए हैं, ताकि अगर अंतिम समय में कांग्रेस में राजद का साथ छोड़ दे तो पार्टी सभी 243 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़ा कर सके।

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